Movie Review : मंटो फ़िल्म रिव्यू लतिका के शब्दों में।

By - लतिका जोशी

मंटो
Photo - india forum


फिल्म समीक्षा: मंटोनिर्माताः विक्रांत बत्रा/अजित अंधारेनिर्देशकः नंदिता दाससितारेः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन



मंटो देखके आई हूं, मन कुछ गंभीर सा हो गया है। नहीं, हॉल से निकलने के बाद दोस्त से काफी लंबी बातचीत की। हम हंसे , ऑफिस के मौज़ूदा माहौल की बातें की, कई बातों पर भड़ास निकाली, कुछ साहित्य की बातें कीं, फिल्म की बात बिल्कुल नहीं की, लेकिन मंटो था कि दिमाग से उतरा ही नहीं। वो चलता रहा साथ उतने ही कदम, जितने मैं चली। मैं कितना चली ये मुझे याद नहीं। मंटो को याद करती हूं तो नवाज़ याद आ रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे ग़ालिब को याद करने पर नसीर याद आते हैं। अच्छा हां...बताना भूल गई कि फिल्म में नवाज़ कहीं भी नहीं हैं, वहां तो मंटो है बस।

जितनी बार 'मंटो' का ख़याल आता है उतनी बार याद आते हैं उनके अफसाने। जितनी बार अफसाने याद आते हैं उतनी बार शरीर में सिहरन सी  दौड़ जाती है, रोंगटे खड़े होने लगते हैं। लेकिन इसके बाद भी जो चीज़ भुलाए नहीं भूलती वो है मंटो की पत्नी के गोल चश्मे के पीछे की सूनी आंखें। वो माहौल, जिसमें कहानियां मिलती थी उन्हें। 

फिल्म देखते हुए आपको ज़िद्दी मंटो मिलता है और दूसरे ही पल हिंदू-मुस्लिम दंगों से घबराने वाला मंटो। आपकी मुलाकात उस मंटो से होती है जो अपनी पत्नी से ये कहते हुए बड़ा बेरहम लगता है कि आखिर में अफसाने ही याद रहते हैं। थोड़ी ही देर में वो मंटो दिखता है जो कहता है कि वो पीना छोड़ना चाहता है, और सबसे ज़्यादा अपनी पत्नी के लिए छोड़ना चाहता है।

वो मंटो जो खस्ताहाल में भी अपने दोस्त से पैसे नहीं लेता, लेकिन उसी दोस्त के तार लेकर घर आता है। वो मंटो जो बड़ी मजबूती से खुद अपना केस लड़ता है और ये प्रूफ करता है कि उसकी कहानियां फूहड़ और अश्लील नहीं हैं। वो मंटो जो इस बात से झुंझलाया है कि फैज़ ने उनकी कहानियों की भाषा को साहित्यिक नहीं बताया, इससे अच्छा वो उन्हें फूहड़ की कह देते।

एक व्यक्ति और कितने सारे किरदार। थैंक यू नंदिता दास, थैंक यू नवाज़। इस फिल्म को और मंटो के किरदार में नवाज़ को हमेशा याद रखा जाएगा।




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