क्या आप जानते हैं, जगजीत सिंह की तरह जसदेव सिंह भी गंगानगर में जन्मे थे






2005 की बात है। मैं शिक्षा बीट देखता था। विभाग के प्रमुख सचिव सीके मैथ्यू के पास बैठा था। एक सरदार जी उनके कक्ष में जैसे ही दाखिल हुए, मैं उस व्यक्ति को प्रसन्न आँखों से देख्रता रहा। जैसे उस श़ख़्स की सजग आंखें उसकी अपनी आवाज़ की कमेंट्री कर रही हैं। उस आदमी की छरहरी सी काया में किसी को चाहे कुछ न लगे, लेकिन उसके कंठ में जो आवाज़ थी, वह जैसे पूरे भारत का ख़ास एसेट थी।

वह जसदेव सिंह थे। मैथ्यू साहब ने उनसे मेरा परिचय करवाया तो वे बोले : अरे, मैं भी गंगानगर से हूं! मैं चौंका। वे हंसते हुए बोले : भई वो मेरा नानका है। मेरे नाना सिंचाई विभाग में एसई हुआ करते थे और मेरी डिलिवरी के लिए मेरी मां गंगानगर गई थी और मेरा जन्म वहीं हुआ। मुझे यह जानकारी काफी सुखदी लगी। मेरी निगाह में क्षेत्रवाद एक तुच्छ सी चीज है, लेकिन अपने क्षेत्र की गंध बहुत कुछ अपनापन लेकर आती है। ख़ासकर जहां, आपके अपने न के बराबर हों।

हिंदुस्तान ऐसा देश है, जहां अपने एसेट्स से किसी को काेई रब्त नहीं। कोई इंटीमेसी नहीं। कोई आत्मीयता नहीं। इसलिए इस देश के अच्छे से अच्छे कलाकार भी ख़राब हाल से गुज़रते हैं। यही कुछ जसदेवसिंह के साथ हो रहा था। वे अपने एक स्कूल का बहुत ही हैरानीजनक प्रकरण लेकर आए थे, जो राज्य के सरकारी तंत्र की निष्ठुरता का उदाहरण भी था। मैंने उनसे विस्तार से जानना चाहा तो उन्होंने कहा, अपना ही देश है। अपने ही लोग हैं। क्या फ़ायदा किसी को शर्मसार करने से।

मैं जिस छवि में दुष्ट तंत्र देख रहा था, उस सरल और तरल इन्सान के लिए वह जैसे चश्म-ए-नाज़ थी। मैथ्यू साहब ने उनकी समस्या का हल करवाया तो वे उनकी तारीफ़ में कहने लगे कई बार सितारे भी फ़लक से नीचे उतर आते हैं। जसदेव सिंह में आत्मीयता कूट-कूट कर भरी थी और अनेक बार उनसे बातचीत हुई। एक छोटी सी मुलाकात एक अटूट सिलसिला बन गई और बहुत बातें हुईं।

जसदेव सिंह की भाषा उर्दू थी और उनका उच्चारण संस्कृत के पंडितों जैसा। भाषा को वे जीते थे। उनकी आवाज़ उन्हें निसर्ग का बहुत बड़ा वरदान थी, जिसे उन्होंने कमाया था।




त्रिभुवन जी केे फसेबूक वाल सेे साभार 





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