मैं गाँधी को नहीं मानता

By - आदर्श राठौर

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"मैं गाँधी को नहीं मानता" 

इस वक्तव्य से जिन के मन में ख़ुशी की लहर और दुख की लहर दौड़ी है.... पहले उनके लिए कुछ कह दूँ.... दोस्त मैं RSS भक्त नहीं हूँ.. और ना ही RSS के विचारधारा को पढ़ के मैंने अपना ये मत दिया है... क्यों कि सारे विचारधारों को पढ़ के मैंने ये जाना है की लोग कैसे किसी विचारधारा के हवाले से अपना स्वार्थ पूरा करते है.... और मीडिया में भी हूँ… थोड़ा आम लोगों के सोचने से ऊपर का सोचता हूँ... और मुझे हर विचारधारा को पकड़ के चलने वालों में कुछ न कुछ कमियां दिखती हैं... और केवल कुछ दिखती तो मैं बुराई नहीं करता...क्योंकि मैं थोड़ा सा पोस्टिव आदमी भी हूँ और तब तक निगेटिव बातें इग्नोर करने की कोशिश करता हूँ जब तक की निगेटिविटी की मात्रा 60 % नहीं हो जाता...तो ये बात ("मैं गाँधी को नहीं मानता")किसी विचारधारा से प्रेरित होकर नहीं... होश-हवास में कहा है और इसके मेरे पास अपने रीजन है...    

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्तूबर 1869 में हुआ था और मेरा जन्म 1994 के वक्त हुआ...और अभी चल रहा है 2018(आप सोच रहें होंगे की इन सब का क्या रिलेशन है)....  महात्मा गाँधी के वक्त में भी मीडिया थी... बेसक संसाधन की कमी थी... पर उस समय में जितनी पहुँच थी वो भी ठीक ठाक थी... क्योंकि बताया जाता है कि आजादी की लड़ाई में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी... तो इसका साफ़ मतलब था कि मीडिया की पहुंच लोगों तक थी और किसी भी आइडियोलॉजी को पिच करने में मीडिया को जो महारत हासिल हैं... और आज की मीडिया का आइडियोलॉजी को पिच करने का जो तरीका हैं अगर उसका 40 % भी उस वक्त आता होगा तो मीडिया अपनी बनाई आइडियोलॉजी और विचार को पिच बखूबी करती होगी (मेरे हर वाक्य में मैंने संसय इसलिए रखा हैं क्योंकी उस वक्त मैं नहीं था)... मीडिया अपनी आइडियोलॉजी को लोगों की आइडियोलॉजी बनाने में माहिर है.. और उस वक्त भी था क्योंकि आजादी में अहम भूमिका निभाई थी.. यानी मीडिया चंद लोगों की आइडियोलॉजी और सोच को उठाकर उसमें अपना नमक मिर्च लगाकर बखूबी परोस रही थी... और वो लोग जिनकी कोई आइडियोलॉजी नहीं थी बस पेपर पढ़ के अपनी आइडियोलॉजी को मीडिया की आइडियोलॉजी से रिलेट कर खुद की आइडियोलॉजी समझते थे..... और उसे पुरे देश का जनादेश मानते थे…

ये सारा समा बांधने का केवल और केवल इतना मकसद था की आप मीडिया का रोल समझ पाओ... और जान पाओ की कैसे छोटी सी मीडिया किसी एक विचार को जनादेश बना सकती है और इसमें कितना पॉवर है...

एक और उदाहरण लेते हैं जिससे की मामला और साफ़ हो जाए... आज के दौर का उदाहरण लेते है... आज सत्ता में मोदी सरकार है...क्यों है क्योंकि जनादेश ने चुना हैं... माफ़ी चाहूंगा व्यक्तिगत तौर पर मैं इसे जनादेश नहीं मानता...क्योंकि मोदी लगभग  पूरी आबादी के 40 % वोटों से चूने गए....और जहां रेशियो 60:40 हो, उसमें पक्ष में मैं तभी बोलता हूँ जब 60 वाला रेशियो उसके पक्ष में हो.. और इसमें कोई दो राय नहीं की मैं बाकी सरकारों के लिए यही मत रखता हूँ( तो मुझे न ही अंधभक्त माने न ही मोदी के खिलाफ)... 

तो बात थी सरकार कि... सरकार साफ़ तौर पर (केवल यही सरकार नहीं बाकी की पिछली सरकारे भी) मीडिया को अपने तौर तरीकों से चलाती है... कुछ सरकारों में कम होता था.... कुछ में ज्यादा....ये बात मैं इसलिए बता रहा की आपको समझा सकूँ की मीडिया इंडिपेंडेंट नहीं चलती...सरकारों द्वारा कई केस में INDIRECTLY   और कई केस में DIRECTLY INVOLVE  होतीं है... तो साफ तौर पर अंग्रेजो के समय या अंग्रेजों की सरकार इतनी तो लूल नहीं थी कि उसे ये बात पता नहीं होगा कि मीडिया के पास कितना पॉवर है और किस तरह से वो लोगों के आइडियोलॉजी को, विचारों को प्रेरित कर सकती हैं...  

मेरा मानना है कि अंग्रेजी हुकूमत गाँधी को खतरा नहीं मानती थी...क्योंकि वो अहिंसा वादी थे.... और केवल बोलने से कुछ फर्क नहीं पड़ता...वो कहावत हैं न की हाथी चलते रहती है और कुत्ते भोंकते हैं.... उस वक्त भी यही हाल था.... केवल अनशन से घंटा फर्क नहीं पड़ता था अंग्रेजी हुकूमत को... उस वक्त हाथी अंग्रेजी हुकूमत जो जब चाहे केवल बोलने वालें लोगों को कुचल सकती थी... क्योंकी उन्हें पता था कि उनके एक्शन पर रिएक्शन में केवल और केवल आवाजें और तेज होंगी...न कि उन्हें उल्टा जवाब मिलेगा.. इसीलिए उन्हें गाँधी से कोई डर नहीं था.... 

ऐसा नहीं था की अंग्रेज डरते नहीं थें... अंग्रेज डरते थे पर केवल उनसे जो उनके एक्शन पर रिएक्शन देतें थे....जब इन अग्रेजों को उन्ही अंदाज में जवाब मिलना शुरू हुआ फिर अंग्रेज में बेचैनी बढ़ने लगी.... अंग्रेजों बुद्धिजीवियों की हालत पतली होने लगी.... फिर एक solution निकाला गया.... भारतीय रिएक्शन को कम करने के लिए मोहरा बनाया गया एक भारतीय को जिसका नाम था गाँधी...गाँधी चुकी छोटे छोटे अस्तर पर अपने तरीके से आंदोलन छेड़े हुए थे तो और उन आंदोलन से अंग्रेजो को कुछ घाटा नहीं था....फिर बड़ा रोल निभाया मीडिया में बैठे अंग्रेजी हुकूमत के चाटुकारों ने.... उन्होंने जनता के विचार से गाँधी को हीरो बनाकर पेश करना शुरू किया...चंद लोगों के नेता को जन नेता बनाना शुरू किया और ये बताना शुरू किया की गाँधी पुरे देश के नेता हैं.... और चुकी अंग्रेजी हुकूमत को इससे दिक्कत भी नहीं थी तो और उभर के गाँधी अपना आंदोलन चलाने लगे.... और इस तरह से गाँधी को हीरो बनाया गया.... इसीलिए "मैं गाँधी को नहीं मानता"












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