#Metoo पर अगर आप पुरुष हैं, तो आप दो तरह की स्थितियों में हैं



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#Metoo पर अगर आप पुरुष हैं, तो आप दो तरह की स्थितियों में हैं-


पहली, कि आप किसी अथॉरिटी का हिस्सा हैं, कुछ Own करते हैं तो खुलकर बोलिए. आपके नीचे बहुत कुछ होकर बिना सुने सुनाए बीत जा रहा है. बोलिए प्लीज़.

दूसरी, कुछ own नहीं करते, स्टूडेंट हैं, मज़दूर हैं, फेसबुक चलाते हैं, गाना गाते हैं, खाते हैं, सो जाते हैं, तो चुप रहिए. टीनएजर हैं तो और शांत रहिए. सन्न एकदम. आप परसेंटेज में 98 हैं. और आपका ये जानना ज़रूरी है कि ये metoo कोई ऐसा कैम्पेन नहीं जो फ़िल्मी और मीडिया दुनिया वाले लोग ही चला रहे हैं क्योंकि ये एलिट अभियान है. नहीं. ऐसा नहीं है. और आपको ये समझना है कि कैसे ?

इसके समर्थन या विरोध में आपको होना ही नहीं है. आपको अभी कुछ बहुत ज़रूरी सा जानना है बस. देखना है, पहचानना है और फिर उसे इन्हेल करना है. सबसे मुश्किल काम यही है. हो ये रहा है कि आप ये मान ही नहीं पा रहे कि, 'ये-ये', 'वो-वो' और यहाँ तक कि 'ऐसा वैसा' भी हरासमेंट के अंदर आता है. आपने कभी भी महिलाओं की 'असहजताओं' को इतने ज़्यादा मात्रा में इकठ्ठा पढ़ा ही नहीं है, सुना ही नहीं है. ऐसी बारिश देखी ही नहीं है. इस अभियान के समर्थन वमर्थन से ज़्यादा जरूरी है कि आप इसका फ़ायदा, 'कंसेंट' नाम की चिड़िया को डिफाइन और क्लियर करने में उठाइए.

Metoo में लड़कियाँ दहाड़ के लिख रहीं हैं और किसी की हिम्मत नहीं हो रही कि उनके पोस्ट पर जाए और उसे भला बुरा बोल आए. ये शानदार सफ़लता है. ये बेहतरीन मौक़ा है कि आप जितनी भी पोस्ट्स पढ़ सकते हैं पढ़ें. आपको यही करना है. आप तनुश्री को नहीं जानते, आप नाना पाटेकर को भी पर्सनली नहीं जानते, इसलिए आपको इसमें मुश्किल हो सकती है कि दोनों में से किसको सही माना जाए और किसको झूठा. ऐसी मुश्किल में कोई लाज नहीं है. बिल्कुल नॉर्मल है ये. वाक़ई, ये एकदम नॉर्मल है. लेकिन लेकिन लेकिन मेरे दोस्त....

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लेकिन आप ऐसे सैकड़ों लोगों को पर्सनली रोज जानते देखते आए हैं, जो आपके साथ ऑटो में बैठते हैं और साथ बैठी अनजान लड़की से जानबूझकर चिपकते हैं. जो आपके साथ चाय पीते हैं और अगले मिनट ब्रा का कलर पहचानते हैं. आपके साथ पढ़ते हैं और किसी 'आइटम' को 'ठोंकने' की बात सीना तान के करते हैं. आजतक आप ये सब आराम से सुनते आए हैं, आपको मज़ा न भी आया हो तब भी. आज़तक इनको सुनने में हिचकिचाहट तो नहीं ही आई है. आपको लगता आया है कि नॉर्मल है ऐसा. क्या आप इसके लिए दोषी हैं ? पता नहीं. लेकिन रुकिए. छोड़िए पुरानी बातें, अब आप इस metoo में आतीं सैकड़ों लड़कियों की कहानियों में से किसी कहानी में इन सभी ऐक्ट्स को भी लड़कियों के 'असहजताओं' के दायरे में पाएँगे. किसी न किसी कहानी में ऐसी बातों को भी हरैसमेंट बोला गया होगा. बस बस बस. आपको यही सीखना है. ये सब उन्हें वाकई टॉर्चर करता है ! और ये भी सीखना है कि क्या क्या और है जो उन्हें टॉर्चर करता है, या कर सकता है. आप इकट्ठा जितनी भी ऐसी 'हिचकिचाहटें' जान सकते हैं, जानिए. ये आरोपों का नहीं, एक्चुअली हिचकिचाहटों का मानसून है. असहजताओं की बारिश है.


Metoo बेहतरीन मौक़ा है दोस्त. मौक़ा है कि एक बाउंड्री पहचानी जाए. समर्थन का कोई मतलब नहीं अगर बात क्लियर हुई ही नहीं हो तो, या समझ आया ही नहीं हो तो. क्योंकि, किसी ने कभी कहा होगा कि, "औरत बहुत पूज्य होनी चाहिए, क्योंकि बहुत त्याग करती है". तभी कोई भीड़ आई होगी और समर्थन में उसे 'देवी' घोषित कर दिया होगा.

और फ़िर क्या हुआ....उसके हजारों साल बाद आज उसी देवी के नवरात्रि के पहले दिन, एक कहानी पढ़नी पड़ रही है, कि उसका बॉस उसे हरैस करता था, या 8 साल की उम्र में उसके किसी रिश्तेदार ने उसके कपड़ों में ऊँगली घुमाई थी. समझिए इसको. आपका चुप रहना और पढ़ना ज़्यादा जरुरी है बजाय किसी नतीज़े पर पहुँचने/न पहुँचने की तेजी, या उसके डर में आए.

इस नवरात्रि आपको कंसेंट मुबारक़ हो !







यह लेख विवेक पांडेय की फेसबुक वॉल से साभार है।








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