पॉलो फ्रेरा और उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र


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इस वर्ष शिक्षाविद पॉलो फ्रेरा की चर्चित किताब ‘पेडागॉजी ऑफ ऑप्रेस्ड’ के पचास वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1968 में छपी इस किताब में व्यक्त शिक्षासंबंधी क्रांतिकारी विचारों का दुनिया भर में स्वागत हुआ। 1921 में ब्राज़ील में जन्मे पॉलो फ्रेरा ने इस किताब में मुक्तिकामी शिक्षा, संज्ञान और विवेकीकरण पर बल देते हुए उत्पीड़ितों के इस शिक्षाशास्त्र को सभी मनुष्यों का शिक्षाशास्त्र कहा। उन्होंने हर तरह की संकीर्णतावादी सोच से बचते हुए शिक्षाशास्त्र को मानवीय बनाने की पैरोकारी की। पॉलो फ्रेरा उन विचारकों में से थे, जिन्होंने यथास्थितिवाद को चुनौती दी और जिनकी सोच वैचारिक जड़ता के घेरों से मुक्त थी। 

उत्पीड़न की प्रक्रिया पर चोट करते हुए पॉलो फ्रेरा ने कहा कि यह मानव-समाज का ‘अमानुषीकरण’ करती है और यह ‘सिर्फ उन पर छाप नहीं छोड़ती जिनकी मनुष्यता को चुरा लिया गया है, बल्कि उन पर भी जिन्होंने दूसरों की मनुष्यता को चुरा रखा है।’ ‘क्रिटिकल पेडागॉजी’ के क्षेत्र में अपने हस्तक्षेपों के लिए प्रसिद्ध पॉलो फ्रेरा ने शिक्षा को ऐसे माध्यम के रूप में देखा जो उत्पीड़ितों को उनकी मनुष्यता फिर से हासिल करने में मददगार होती है। 

इस क्रम में, उन्होंने उत्पीड़ितों को यह कहते हुए सचेत भी किया कि वे पुनः अपनी ‘मनुष्यता प्राप्त करने के प्रयास में उत्पीड़कों के उत्पीड़क न बन जाएं, बल्कि दोनों को ही मनुष्य बनाने वाले बनें।’ उनके अनुसार उत्पीड़ितों का यह ‘मानवतावादी और ऐतिहासिक कार्यभार’ है कि वे अपने साथ-साथ अपने उत्पीड़कों को भी मुक्त करें। 

संघर्ष के शुरुआती दौर में उत्पीड़ितों की सीमाओं से और उत्पीड़ितों में उत्पीड़कों और उनकी जीवनशैली के प्रति आकर्षण से भी वे भली-भांति परिचित थे। इसीलिए उन्होंने कहा कि संघर्ष के आरंभिक चरण में ‘उत्पीड़ितों में मुक्ति का प्रयास करने के बजाय स्वयं उत्पीड़क बनने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।’ 

दूसरे शब्दों में, ‘उत्पीड़ितों का आदर्श तो मनुष्य बनना होता है लेकिन वे “मर्द” बनना चाहते हैं।’ इसीलिए पॉलो फ्रेरा ने उत्पीड़कों की हिंसा और प्रेमविहीनता के विरुद्ध इस संघर्ष में प्रेम की उल्लेखनीय भूमिका पर ज़ोर दिया।     

मुक्तिकामी शिक्षा का विचार उनके लिए महज सैद्धांतिक बात नहीं थी, बल्कि यह सीधे तौर पर मानवीय आचरण और व्यवहार से सम्बद्ध थी। अकारण नहीं कि अपनी बाद की किताबों, मसलन ‘पेडागॉजी ऑफ होप’ (1992) और ‘पेडागॉजी ऑफ फ़्रीडम’ (1996), में वे उम्मीदों और मुक्ति के शिक्षाशास्त्र की वकालत कर रहे थे। 

उनके लिए शिक्षा महज़ सूचनाओं का हस्तांतरण न होकर ‘संज्ञान का कर्म’ थी। उन्होंने संवाद को एक मानवीय परिघटना के रूप में देखा और चिंतन और कर्म पर ख़ास ज़ोर दिया। पर फ्रेरा हमें आगाह करते हैं कि “संवाद उनके बीच नहीं हो सकता, जिनमें एक तरफ दूसरों को अपना शब्द बोलने का अधिकार न देने वाले हों और दूसरी तरफ वे जिनसे अपना शब्द बोलने का अधिकार छीन लिया गया हो।” मई 1997 में इस महान शिक्षाविद का निधन हो गया।   

‘पेडागॉजी ऑफ ऑप्रेस्ड’ का हिंदी अनुवाद ‘उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र’ (ग्रंथशिल्पी प्रकाशन) शीर्षक से रमेश उपाध्याय ने किया है। जरूर पढ़ें यह किताब!




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