सच्ची घटना पर आधारित कहानी अनकही अधूरी- प्रीति






आज भी अच्छी तरह याद है वो दिन, जब सातवी कक्षा में मुझे अचानक स्कूल के बीच मे पढ़ाई छोड़ गांव जाना पड़ा, हालांकि मेरा जाना सिर्फ दो महीनों का था लेकिन कभी नही सोचा था। इतने से वक़्त में,मैं तुम्हे हमेशा के लिए खो दूँगी। आखिरी दिन था मेरा स्कूल में जब तुमने मुझसे मेरी कान की बालियां ये कह कर मांगी थी कि "जागृति ना जाने फिर कभी मुलाकात हो या ना हो,तेरी निशानी के तौर पर तेरा कोई सामान मुझे दे दे। तेरी याद के तौर पर हमेशा मैं उसे अपने पास संभाल कर रखूंगी।"

उफ्फ.......लड़कपन की वो मासूम सी हमारी दोस्ती। मैंने भी हँसते हुए अपनी बालियां उतार कर तुम्हारे हाथों में रख दी थी। उस वक़्त मुझे जरा भी अंदाजा नही था कि तुम्हारा कहा वाकई में एक दिन सच हो जाएगा और हम फ़िर कभी नही मिल सकेंगे। अगर पता होता तो मैं तुम्हे छोड़, कभी नही जाती। गांव नहीं जाने के लिए लड़ जाती पापा से। याद है मुझे, जब मैं पहली बार स्कूल आयी थी तुम कितना खुश हुई थी। उस वक़्त हमारे स्कूल में मैं पहली लड़की थी जो उसी स्कूल के एक शिक्षक की बेटी थी। तुम सबसे ये कहती फिर रही थी कि सर की बेटी अब से हमारे साथ हमारे क्लास में पढ़ेगी। पूरे स्कूल में तुम उछल - उछल कर मुझे सबसे मिला रही थी।

12 साल हो गए तुम्हे गए। लेकिन आज भी मेरे ज़ेहन में तुम्हारी मासूम सी शक्ल वैसी ही बनी हुई है। गोरा-चिट्टा, खुबसूरत सा चेहरा, लंबे घने काले बाल, गुलाबी होंठ और उसपर तुम्हारी सुबह की लाली सी प्यारी  मुस्कान। वो काला फ्राक तुम्हारे गोरे रंग पर खूब फबता था। पूरे स्कूल में सिर्फ तुम ही तो थी जो हर 15 अगस्त और 26 जनवरी पर बुलंद आवाज़ में भाषण देती थी। वो तुम्हारे भाषण के बाद तालियों की आवाज़ अब भी मेरे कानों में गूँजती है। पूरी क्लास में सबसे सुंदर लिखावट भी तो तुम्हारी ही थी। कितनी बार मेरी और विनोद की कापियां लिख - लिख कर तुमने ही पूरी की थी। हर टीचर की पहली पसंद भी तुम थी और प्रज्ञा मैम वो तो हमेशा हर चीज में सबसे पहले तुम्हारा ही नाम लेती थी।

आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। अकेली पड़ गयी हूँ मैं। बचपन की उस मासूम सी दबी हुई हँसी में साथ देने वाला अब मेरे पास कोई नही है। क्या दिन थे वो जब हम कई बार अंकिता की शादी की बात करके हँसते थे। लेकिन, उसे पता भी नही चलता था की हमारी हँसी की वजह वो है। जानती हो अंकिता की शादी हो गयी और अब तो उसके दो जुड़वा बच्चे भी है।

बिना बात जब तुम नाराज़ होकर सबसे पीछे जाकर बैठ जाया करती थी; राजेश कितना गुस्सा हो जाता था क्योंकि, तुम उसकी ही जगह पर तो जाकर बैठती थी। दूसरों का पता नही लेकिन आज भी मैं और राजेश जब भी मिलते है तो तुम्हारी कोई बात जरूर निकल आती है। 

बहुत बड़ा झटका लगा था जब तुम्हारे मौत की ख़बर मिली थी। पहले तो यकीन नहीं हुआ लेकिन जब यकीन हुआ तो ऐसा लग मानो सब कुछ बदल चुका हो। पापा ने बताया था कि कैसे तुमने खुद पर मिट्टी का तेल डाल कर खुद को आग लगा ली थी। सिर्फ 13 साल की थी तुम कैसे तुम्हारे मन में ये ख्याल आया।


काश......... उस दिन तुम खुद को रोक लेती, तो आज राजेश, सचिन, अंकिता,मैं और तुम एक साथ बाकी लोगो की तरह कही बैठ कर गप्पे मारते और तुम्हारी बुआ की कहानियां सुनते। तुम्हारी मौत की वजह आज भी हम सब के लिए राज़ बनी हुई है।

काश वक़्त का पहिया पलट जाए और हम फिर एक बार वापस अपने स्कूल वाले दिन में लौट जाए, जहाँ तुम्हारी मौत को हम सब मिल कर हरा दे। मैं तुम्हे कभी खुद से दूर नही होने देती। 

बहुत कुछ कहना है तुमसे, बहुत सारी शिकायतें है। लेकिन अल्फ़ाज़ आज कम पड़ गए। इन डबडबाती आंखों से अब शब्द भी धुंधले से नज़र आ रहें है। इसीलिए इस अनकही दास्तां को यही खत्म कर रही हूं। 


हमेशा की तरह 'अधूरी'....





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