उस्ताद की कमीज़ में सफेदी ला सके, ऐसा कोई साबुन या डिटेरजेंट मिलेगा उसे



मुझे 20 रुपया रोज मिलता है, और हाँ कुछ खाने पीने का भी पूछ लेता है मालिक। दूसरे दर्ज़े तक पढ़ा फिर छोड़ दिया। नहीं मन तो था आगे पढ़ने का। हाँ कुछ मजबूरियों की वजह से ही.. नहीं नहीं अब क्या जाऊँगा पढ़ने ? मेरा बड़ा भाई भी यहीं काम करता है। उसने ही सिखाया मेरे को।

आता ही होगा। ये भाई हैं मुझे पूछ रहे हैं, मेरी बातें। भाई, यही है मेरा बड़ा भाई, 10 साल का उस्ताद बोल रहा था।  "अरे उस्ताद है उस्ताद! पंक्चर तो ऐसे लगाता है जैसे नई दुल्हन के माथे पर बिंदी। बहुत आगे जाएगा छोटू", तम्बाकू फाँकते हुए एक चचा बोले।


मैं बस यही सोच रहा था, कितना आगे जाएगा वो उस्ताद, 20 रुपये वाला पंक्चर का उस्ताद। अभी अगर उसकी हथेलियों को छू लूँ तो किसी दरख़्त की छाल जैसी मजबूत होंगी। उसकी कमीज़ में सफेदी ला सके ऐसा कोई साबुन, ऐसा कोई डिटेरजेंट मिलेगा उसे?

स्थान - अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय मुख्य द्वार के सामने, पुरानी चुंगी, अलीगढ़।


यह पोस्ट धर्मेंद्र सिंह कुंठल के फेसबुक वॉल से साभार है।




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