प्रभु, झूठ का मूल कौन सा है? क्या उसका कोई अंत है ही नहीं

By - ऋषभ

‘कुछ देर बाद उस प्रेत ने पूछा- प्रभु, झूठ का मूल कौन सा है ? क्या उसका कोई अंत है ही नहीं ?’



संतेशिवरा लिंगण्णैया भैरप्पा (एस एल भैरप्पा) के उपन्यास ‘साक्षी’ की आखिरी पंक्ति है ये. इस उपन्यास में परमेश्वरैया झूठी गवाही देने के बाद आत्महत्या कर लेता है और प्रेत बनकर ईश्वर के पास पहुंचता है. उसे अपने लोगों के मन को पढ़ने की शक्ति मिल जाती है. उसका दामाद मंजैय्या अत्यंत कामुक पुरुष है जिसने उसकी बेटी सावित्री को फंसाकर विवाह कर लिया है. परमेश्वरैय्या एक बात सबसे छिपा जाता है कि मंजैय्या ने बहुत पहले सावित्री की मां से भी शारीरिक संबंध बना लिया था. सब कुछ जानने के बाद परमेश्वरैया के प्रेत के सामने जब मंजैय्या और सावित्री की मां के प्रेत आते हैं, तब भी परमेश्वरैय्या की समझ में कुछ नहीं आता. वो झूठ के बारे में यही पूछता रह जाता है.


१९३१ में पैदा हुए भैरप्पा ने अपने लगभग ६० सालों के साहित्यिक जीवन में २६ उपन्यास और एक आत्मकथा लिख डाली है. कन्नड़ के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक हैं ये. कन्नड़ के दूसरे लोकप्रिय लेखक यू आर अनंतमूर्ति से इनकी भयंकर लड़ाई चलती थी. अनंतमूर्ति ने भैरप्पा के उपन्यास ‘आवरण’ के संदर्भ में यहां तक कह दिया था कि भैरप्पा को उपन्यास लिखने नहीं आता. अनंतमूर्ति लेफ्ट लिबरल प्रोग्रेसिव लेखक थे और भैरप्पा ने परंपरा और आधुनिकता की लड़ाई में परंपरा का पक्ष लेने की कोशिश की है. हाल के वर्षों में उन्होंने दक्षिणपंथ की राजनीति के पक्ष में खुलकर बोला है. इस साल जनवरी में कहा कि मोदी से प्यार करना चाहिए लोगों को. भैरप्पा को नेशनल प्रोफेसर बनाये जाने की कवायद चल रही है.

ऐसे में भैरप्पा के लिखे उस प्रेत की बात वर्तमान समय के फेक न्यूज के दौर में महत्वपूर्ण हो जाती है. मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक नफरत के वक्त में दक्षिणपंथ पर फेक न्यूज फैलाये जाने का आरोप लग रहा है. यहां भी वही प्रश्न उठता है- प्रभु, झूठ का मूल कौन सा है? क्या उसका कोई अंत है ही नहीं ?’

भैरप्पा की साहित्यिक यात्रा भी इसी वजह से रोचक हो जाती है. अगर लेखन की बात करें तो इनके लेखन में मिथक, कल्पना, परंपरा, मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान खूब उभर के सामने आते हैं. अगर इनकी आत्मकथा ‘भित्ति’ की बात करें तो लेखक के प्रति प्यार उमड़ आता है और इनके संघर्षों के प्रति आदर. बंबई स्टेशन पर कुली का काम करने से लेकर सिनेमाहॉल के गेटकीपर तक का काम किया है भैरप्पा ने. दस साल की उम्र में ही परिवार को खो देनेवाले भैरप्पा ने एक ही दिन में भाई-बहन दोनों की मृत्यु देखी थी. अत्यंत गरीबी में पले भैरप्पा को मृत्यु का विषय आकर्षित करता था. यही आकर्षण उनको फिलॉसफी में खींच लाया. और फिर साहित्य में.



अपने साहित्य के लिए भैरप्पा ने बहुत यात्राएं की हैं. देश के राज्यों से लेकर विदेशों की खूब ही यात्रा की है. इनके उपन्यास तंतु और आवरण में दिल्ली और बनारस समेत गया तक का ऐसा जिक्र है कि लगता है जैसे वो यहीं रह के गये हों. अपने उपन्यास पर्व के लिए खूब रिसर्च भी की थी. ये बातें उनके बाकी उपन्यासों पर भी लागू होती हैं. पूरी तैयारी के साथ ये उपन्यास लिखे गये थे.



परंतु उनकी साहित्यिक यात्रा सीधी चलती हुई जब दाहिने मुड़ती है तो समझ नहीं आता कि क्या कहें. लेखक को पात्र और कहानी गढ़नी चाहिए या फिर अपने आइडियोलॉजिकल रुझान को लेखन का दुरुपयोग कर पाठकों के मन में ठेल देना चाहिए ?

दुनिया में बढ़ते दक्षिणपंथी वर्चस्व के वर्तमान में भैरप्पा के लेखन से ज्यादा उनके राजनीतिक कमेंट सामने नजर आते हैं और इस वजह से उनके लेखन को बरबस राजनीतिक चश्मे से ही देखना जरूरी हो जाता है.

उनकी आत्मकथा पढ़ने के बाद ये अपरिहार्य हो जाता है कि हम हर उपन्यास में लेखक से पीड़ित के प्रति संवेदना खोजें. संवेदना मिलती तो है, पर वो सबके लिए नहीं है. ऐसा लगता है कि ये संवेदना कथित उच्च जाति के हिंदू के लिए है जो अपने वीर्य से लेकर जीवन में कथित शुचिता को लेकर बहुत सचेत रहता है.



इसका प्रमाण मिलता है ६० के दशक में आये इनके उपन्यास वंशवृक्ष में. इसमें प्राचीन वैदिक रीति से जीवन जीनेवाले श्रोत्रियजी की बातों को सही ठहराया गया है. श्रोत्रिय जी अपनी जवान विधवा बहू को दूसरी शादी करने से रोकते नहीं हैं, परंतु ये जरूर कहते हैं कि जीवन में पुत्र पैदा कर तुम स्त्रीत्व का एक स्तर पार कर चुकी हो, तो फिर वापस निचले स्तर पर जाने का कोई मतलब नहीं है. श्रोत्रियजी अपनी पत्नी के रोगवश उनसे सहवास नहीं कर पाते हैं, तो उनकी पत्नी एक स्त्री लक्ष्मी को उनसे सहवास के लिए राजी कर लेती है. 

पर श्रोत्रियजी सहवास के लिए जाते वक्त अपनी इच्छा को नियंत्रण में लाते हैं और समस्त चराचर जगह मानो उनके चरणों में गिर पड़ता है. इस उपन्यास में जिस पात्र ने दूसरी शादी की है, वो बच्चा पैदा नहीं कर सका है और बहुत ही कटु भावनात्मक मौत को गले लगाया है. श्रोत्रियजी इन चीजों को भीष्म पितामह की तरह देखते रहते हैं. सिर्फ उपन्यास की दृष्टि से देखें तो प्राचीन हिंदू सभ्यता और बौद्ध धर्म के तत्वों को इस किताब की फिलॉसफी में लाया गया है, जो कि अद्भुत है. परंतु लेखक का इक्कीसवीं शताब्दी में जीवन के प्रति आशय समझ लेने के बाद ये अद्भुत लेखन आधुनिकता के प्रति एक षड़यंत्र जान पड़ता है.

इसी तरह इनके बहुचर्चित उपन्यास ‘पर्व’ में महाभारत के पात्रों की जीवनी को नई दृष्टि से लिखा गया है. ये नई दृष्टि भी लाजवाब है. इसमें लेखक ने नियोग प्रथा से लेकर अर्जुन समेत सबकी कई शादियों को बहुत ही तार्किक ढंग से सामने रखा है. यहां तक कि कृष्ण के पांडवों की तरफ और बलराम के कौरवों की तरफ होने की घटना को भी सुलझा के लिखा है. यहां पर इस तर्क के माध्यम से राहुल गांधी और सोनिया गांधी के विदेशी होने के मुद्दे को सुलझाया जा सकता है. विवाह कर के लाई गई स्त्री अधिकारिणी बनती है. और बहू की संतान पुत्र की संतान भी होती है. इसके अलावा उपन्यास में पांडवों समेत यादवों के बैल का मांस खाने को प्रमुखता से दिखाया गया है. भैरप्पा यहां पर कोई संकोच नहीं करते. भीष्म के शरीर त्याग का वर्णन भी बेहद शानदार है. उपन्यास में पात्रों के मनोभाव और घटनाओं का नवीन चित्रण है.


एक बात इस उपन्यास में अलग नजर आती है. हर इंसान के जीवन की क्रियाओं खाना-पीना, आराम, सहवास सबके बारे में वर्णन है. परंतु मल-त्याग का वर्णन सूतपूत्र कर्ण के ही संदर्भ में है. ये बात किसी क्षत्रिय का वर्णन करते हुए नहीं लिखी गई है. ये लिखना लेखक का मूल उद्देश्य नहीं रहा होगा. परंतु जब हम लिखे हुए में पैटर्न की तलाश करते हैं तो ये चीजें सबकॉन्शस माइंड से आती हुई प्रतीत होती हैं. आज जब दलित लेखन की बात होती है, तो यही चीजें परंपरा की शक्ल में सामने आती हैं.

वहीं इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल से ठीक पहले के उपन्यास तंतु में उस समय की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक समस्याओं का बेजोड़ चित्रण है. उपन्यास का अंत आपातकाल लगने के साथ होता है. इसमें जेल में बंद अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का भी जिक्र है. इसमें वर्णन है अखबारों के मालिकों पर हो रहे अत्याचार का. ट्रिब्यून के संपादकों पर सरकार की गाज गिरती है तो अखबार के मालिक अपना सुर बदल लेते हैं. संपादक रिजाइन कर नया अखबार शुरू करता है तो उसके आईएएस बेटे और बिजनेसमैन दामाद पर दनादन छापे पड़ते हैं. संपादक जब विदेशी अखबार में नौकरी कर साधारण खबरें करने लगता है तो ये छापे बंद हो जाते हैं. ये सारी घटनायें आज के परिदृश्य की तरह हैं. ताज्जुब की बात ये है कि ये सारी बातें दक्षिणपंथ से रूझान रखनेवाले लेखक की हैं.



पर इसमें भी जो व्यक्ति शादी तोड़कर अलग संबंध बनाता है, उसकी दुर्गति होती है. कांति जब अपने एडिटर पति को छोड़ देती है तो अपनी सरकारी नौकरी वाली सहेली शीतल गुप्ता के साथ मिलकर कंपनी खड़ी कर लेती है. परंतु पति के दोस्त होन्नति से शारीरिक संबंध स्थापित करने के बाद उसका जीवन उथल-पुथल भरा हो जाता है. लगभग नौ सौ पन्नों के इस उपन्यास में जीवन, राजनीति, संबंधों का बेहद शानदार चित्रण है. बिजनेसमैन और राजनीति का समन्वय किस तरह से समाज को डुबाता है, ये भी दिखाया गया है. साथ ही ये भी दिखाया गया है 

व्यक्तिगत आचरण और गांधीवादी शिक्षा की वकालत करनेवाले किस तरह आधुनिक जीवन में निरर्थक साबित हो जाते हैं. परंपरागत जिंदगी और आधुनिकता के पैसे और आराम की चकाचौंध में समझ नहीं आता कि किसका अनुकरण करें. महाजनो येन गतः स पंथा वाली बात भी पल्ले नहीं पड़ती. ऐसा लगता है कि जीवन में चाहे कुछ भी कर लो, अंततः दुख ही है हिस्से में. ऐसे परिप्रेक्ष्य में युवा सहवास और त्वरित खुशी वाली चीजों की तरफ ही भागता है.

सबसे विवादास्पद उपन्यास लिखा है भैरप्पा ने- आवरण. कई दशकों तक जीवन-मृत्यु, हिंदू और बौद्ध फिलॉसफी, स्त्रियों की मुक्ति-संघर्ष लिखने के बाद भैरप्पा से उम्मीद थी कि जब वो हिंदू-मुसलमान का विषय उठायेंगे तो कुछ हल सामने रखेंगे. सच्चर कमिटी की रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में ज्यादातर मुसलमान निम्न वर्ग में आते हैं. खुद भैरप्पा ने भी निम्न वर्ग से ही शुरूआत की थी. भैरप्पा फैक्ट्स को लेकर लेखन कार्य करते भी हैं. पर ऐसा नहीं होता है.


भैरप्पा की सहानुभूति ब्राह्मणगत हिंदू धर्म से है. ऐसा वो इस उपन्यास में खुलकर जाहिर करते हैं. अगर हमारा समाज हिंदू-मुसलमान के द्वंद्व में नहीं उलझा होता तो ये उपन्यास एक शानदार प्रयोग था. जिसमें एक हिंदू लड़की मुसलमान से शादी करती है. इसके लिए लड़की का विद्वान पिता राजी नहीं था. बाद में वो लड़का धर्म परिवर्तन पर जोर देता है और शादी टूट जाती है. इसी के समानांतर देवगढ़ रियासत के एक राजकुमार की कहानी चलती है जिसे मुसलमान राजाओं ने हिजड़ा बना दिया है और वो दास बने हुए अकबर के दरबार में पहुंच जाता है. ये कहानी अच्छी होती, क्योंकि कहानी कुछ भी हो सकती है.




पर जब कहानी को इतिहास की लिखी गई किताबों और रिपोर्ट्स से भर दिया जाये तो शक पैदा होने लगता है. उपन्यास में टीपू सुल्तान समेत अकबर सबको धर्मांध घोषित किया गया है. हजारों मंदिरों के तोड़े जाने का जिक्र है. इसके लिए तमाम इतिहास की किताबों का नाम दिया गया है लिस्ट बनाकर. उपन्यास का मुख्य पात्र भी उपन्यास ही लिख रहा है. पर ऐसा लगता है भैरप्पा अपने मन की सारी बातें उस पात्र से कहलवा रहे हैं. कुछ इस तरह की बातें सामने आती हैं-
१. मुसलमान शासक होमोसेक्सुअल रेपिस्ट होते हैं.
२.शैव-वैष्णव लड़ाइयां मुसलमानों के मंदिर तोड़ने के काम को सही साबित करने के लिए गढ़ी गई थीं. ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था.
३. लड़की जब हिंदू धर्म पुनः स्वीकार करती है और बीफ खाने वगैरह का पश्चाताप करती है तब उसमें जीवन का सामना करने का नैतिक बल आता है. उसके लिखे हुए के लिए सरकार उसे प्रताड़ित करती है और अंत में उसका मुसलमान पति भी उसकी बात को सही मानता है.
ये काफी कुछ डैन ब्राउन के लिखे दा विंची कोड जैसे उपन्यासों के मेक-बिलीव तरीके का है. जिसमें अपनी बातें कहने के लिए कई फैक्ट्स का सहारा लिया जाता है, जिनमें पूरी बातें नहीं आ पातीं. कई बार ऐसा लगता है कि लेखक मुसलमान राजाओं के हाथों हुई हिंदू राजाओं की हार के दुख से उबर नहीं पाया है. जिसके ना उबर पाने की कोई वजह नहीं है. ना ही आज के वक्त में उन मुसलमान राजाओं को हंता साबित कर देने से कोई फायदा है.
अगर इसको ऐतिहासिक उपन्यास की दृष्टि से देखें तो रोचक विषय है जो कि बहुत अच्छा लिखा जा सकता था. पर कुछ साबित करने के चक्कर में इसका लेखन सपाट हो गया है. लेखक के बाकी उपन्यासों की तरह इसके पात्र उतने जटिल नहीं हो पाते. ये श्वेत-श्याम में सोचते हैं. और ऐसा मानते हैं कि आज के मुसलमान मध्ययुग के मुसलमान शासकों की तरह क्रूर हैं. ऐसा भी प्रतीत होता है कि मध्ययुग के सारे मुसलमान एक थे. तुर्क, मंगोल, पठान, मुगल सबमें कोई फर्क नहीं है. ये सारी चीजें पढ़ने पर मन निराश हो जाता है. ‘साक्षी’ जैसा शानदार उपन्यास लिखनेवाले लेखक से ये उम्मीद नहीं थी.
पर सारी बातों की एक बात. अगर लेखक को उसके लेखन से देखें तो भैरप्पा का लेखन अतुलनीय है. कल्पना गजब है. लेखन की क्षमता गजब है. इतने वर्षों तक अनवरत लिखते रहना ही अपने आप में अद्भुत है. इनकी किताबों का हिंदी और अंग्रेजी समेत गुजराती और मराठी में भी अनुवाद हुआ है. बस नहीं अनुवाद हो पाया तो इनके जीवन के मर्म का. जिस हिंदुस्तान में एक गरीब घर में पैदा हुए भैरप्पा को जीवन की इतनी सार्थकता मिली, उसी हिंदुस्तान में समाज के एक बड़े वर्ग के प्रति नफरत फैलाकर उनके अस्तित्व को ही निरर्थक किया जा रहा है. भैरप्पा को एक उपन्यास इस पर भी लिखना चाहिए. चाहे लेखक किसी भी धारा का हो, वो लिख तो सकता ही है.


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