जब मुकुल द्विवेदी को न्याय नहीं मिला तो सुबोध को कैसे मिलेगा


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बुलंदशहर में मॉब लिंचिंग के शिकार हुए इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की घटना ने दो साल पुहले मुकुल द्विवेदी मर्डर की यादें ताजा कर दीं. बरेली के दिनों के मित्र मुकुल द्विवेदी बाद में स्थानांतरित हुुए तो सीओ से मथुरा के एसपी सिटी बने थे. सपा की सरकार थी. सरकारी शह पर कारिंदों की तूती बोलती थी. तारीख दो जून 2016... कोर्ट का आर्डर आया तो ढोंगी बाबा राम वृक्ष यादव के कब्जे से जवाहर बाग को खाली कराने गए थे. कई एकड़ बेशकीमती जमीन वाली इस बाग पर बाबा ने अनशन के नाम पर वर्षों से कब्जा जमा रखा था. सरकार में ताकतवर रहे प्रोफेसर साहब का बाबा चेला बताया जाता था. 

मुकुल मय फोर्स पहुंचे तो बाबा के गुर्गों ने कट्टा-कारतूस और लाठी-डंडा लेकर हमला बोल दिया. क्योंकि तब के एसपी की तैनाती प्रोफेसर साहब की कृपा से ही हुई थी तो बाबा को भी लगता था कि पुलिस फोर्स अपना कुछ न उखाड़ पाएगी. एसपी सिटी मुकुल और साथ मौजूद जाबांज दारोगा को राम वृक्ष के गुर्गों ने बाग में दौड़ा-दौड़ाकर गोली मारी और लाठी-डंडे से पीटकर मार डाला था. साथ गई बहादुर फोर्स भाग खडी़ हुई थी. उस वक्त इसमे एक बडे पुलिस अफसर की भूमिका पर भी सवाल उठे थे.

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घटना के दो साल बाद भी मुकुल की विधवा अर्चना दूबे को फरियाद नहीं मिल सका है. पति को जरूरी सरकारी सम्मान और अन्य सहायता नसीब नहीं हुई है. न ही जांच पूरी हो सकी है.  हाल में दो जून को जब घटना की बरसी आई त वह जवाहरबाग में श्रद्धासुमन अर्पित करने गईं थीं, तब उनकी आंखें छलछला उठी थी. सरकार ने बाग में एसपी सिटी और दारोगा के नाम स्मारक बनाने की घोषणा की थी, कुछ नहीं हुआ. तब सरकार सपा की  थी और बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाकर खूब भुनाया था. 

आज बीजेपी सरकार में है, फिर भी मुकुल के परिवार को इंसाफ नहीं मिल पाया है. अर्चना का कहना है कि जांच को बेवजह लंबा खींचकर आरोपियों को बचाया जा रहा है. इसमें कुछ पुलिस अफसर भी मिले हुए हैं. मुकुल के भाई भी मुकुल वांट जस्टिस कैंपेन चलाकर थक चुके हैं. आखिर शासन-सत्ता में बैठा कौन है जो जालिमों को बचा रहा है.

वह कौन अफसर है, जिसने मुकुल द्विदी के जाने से पहले ही रामवृक्ष एंड कंपनी को सूचना भेज दी थी कि तैयार रहो धमाके के लिए....

खास बात है एक बीजेपी नेता हैं अश्विनी उपाध्याय।  वह  निजी स्तर से  जवाहर बाग से जुड़ा केस लड़ रहे है.  इलाहाबाद हाईकोर्ट में उन्होंने मुकदमा कर रखा है. मगर शासन के स्तर से सहयोग न मिल पाने के कारण जांच ही सही दिशा में नहीं चल रही है. ऐसे में यह केस भी कुछ गुल नहीं खिला पा रहा है. 

यह सब देखकर हमें डर लग रहा है कि कहीं सुबोध सिंह का मामला भी मुकुुल द्विदी जैसा न हो जाए....





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