चूर-चूर - चकनाचूर हड्डियों को भी जोड़ता है ये शख्स

By - अमरेन्द्र किशोर

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ओडिशा की राजधानी भुबनेश्वर से कोई ७० किलोमीटर दूर स्थित कालूपाड़ाघाट नामक बस्ती वैसे लोगों के जीवन की आस है जिनकी हड्डियां विभिन्न हादसों में चूड़-चूड़ हो चुकीं होतीं हैं। यह बस्ती पारम्परिक चिकित्सा-केंद्र के तौर पर बेहद मशहूर है, जहाँ अरुण कुमार दास मरीजों का इलाज करते नजर आते हैं। टूट-फूट चुकी हड्डियों को जड़ी-बूटियों के लेप चढ़ाकर जोड़ने की परम्परा अपने देश में युगों से चली आ रही है-- इस काम को अंजाम देनेवाले लोग हड़-जोड़वा कहे जाते हैं, यानि हड्डियां जोड़नेवाले। हड्डियां जोड़ने का पुश्तैनी काम अरुण का है।  लिहाजा, वह गरीबों के मसीहा के तौर पर जाने जाते हैं।  


"बड़े-बड़े अस्पतालों से इलाज करवाकर, लाखों रुपये फूंक-फेंक कर लोग जब अपंगता को अपनी नियति मान लेते हैं तो उन्हें अरुण कुमार दास की याद आती है", सबुज विप्लब संस्था के प्रमुख संतोष दास बताते हैं, जो खुद एक मंजे हुए नाड़ी वैद्य हैं। संतोष की बातों में दम नजर आता है, जब हमारी मुलाक़ात होती है जारां गाँव की कुन्नी दाधे से -- बीते महीने कुआँ में गिरने से उसके दोनों पैर की हड्डियां चकनाचूर हो गयीं। "भुबनेश्वर के अस्पताल में इलाज केलिए लाख रुपये का खर्च बताया गया तो मैं हार कर यहां चली आयी।" कुन्नी ने खुश होकर आगे बताया कि उसके बाएं पैर में अब ताक़त महसूस हो रही है। नयागढ़ के पबित्र बहेरा पेशे से राजमिस्त्री हैं-- कोई हफ्ते भर पहले सड़क दुर्घटना के शिकार हो गए और उनके दाएं पैर की हड्डी टूट गयी। खुर्दा के तपन कुमार भैरमाल भी निर्माण-मजदूर हैं और छत से गिरकर होश खो बैठे। परिवार के लोगों और पड़ोसियों की मदद से कालूपाड़ा लाये गए तो पता चला कि जांघ की हड्डी 'फीमर' टूट चुकी है। लेकिन महीने भर के इलाज के बाद तपन अब हौले-हौले चलने लगे हैं। 

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- अरुण कुमार दास 

अरुण अपनी चिकित्सा पद्धति को पूरी तरह से पारम्परिक और प्राकृतिक बताते हैं। अपने दादा नित्यानंद दास द्वारा दी गयी हिदायत नहीं भूलते कि मानवता के हितों केलिए विकसित यह इलाज पद्धति कहीं आवारा पूंजी के बल पर नीलाम न हो जाए। यही वजह है कि अरुण के बेहद ख़ास और विश्वासी लोग बोतिया पहाड़ के जंगलों से २० विभिन्न किस्म की जड़ी-बूटियां लाते हैं मगर उन्हें तैयार करने का नुस्खा या तो अरुण जानते हैं या उनके बच्चे। "यह लेप टूटी हड्डियों केलिए फेविकोल है सर ! जोड़कर ही मानता  हैं", अरुण के छोटे लड़के अनुज कुमार दास काले रंग के लेप की ओर इशारा करते हुए बताते हैं। 

"हड्डियां जोड़ना ही असली हुनर का काम है और लेप के साथ पट्टियां लगाना भी सहज नहीं। बाद में चोटग्रस्त अंगों की सिंकाई करना जोखिम का काम होता है", अनिल अपनी बात पूरी करते हैं। अरुण कुमार दास के तीनों बेटे अश्विनी-अनुज और अनिल आज इसी काम में उनका हाथ बँटाते हैं।   

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लाचार रोगियों को सामान्य करने में अरुण को अंदर से खुशी मिलती है। वह अपने दिवंगत पिता हर्षिकेश दास को याद कर उन्हें दिल से आभार प्रकट करते हैं, जिनसे उन्हें यह  चमत्कारिक इलाज पद्धति सीखने का मौक़ा मिला। करीब २५ सालों से इस काम में लगकर अरुण ने हजारों लाचार लोगों के चहरे पर मुस्कराहट लौटाने का काम किया है और न जाने कितने परिवारों को भूखे मरने से बचाया, जिनका कमानेवाला हाथ हादसों का शिकार होकर लगभग अपाहिज होने के कगार पर था। मरीजों को मिलनेवाली खुशियों को अरुण देवी माता का आशीर्वाद मानते हैं।



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