इक्कीसवीं सदी के लिए नारीवाद का घोषणापत्र



प्रसिद्ध राजनीतिविज्ञानी और नारीवादी विचारक नैन्सी फ्रेज़र ने सिंजिया अरुज़ो और तिथि भट्टाचार्य के साथ मिलकर इक्कीसवीं सदी के लिए नारीवाद के घोषणापत्र का प्रारूप तैयार किया है। जो ‘नोट्स फॉर ए फ़ेमिनिस्ट मेनिफेस्टो’ शीर्षक से ‘न्यू लेफ़्ट रिव्यू’ के नवंबर-दिसंबर 2018 के अंक में छपा है। नैन्सी फ्रेज़र को हैबरमास की पब्लिक स्फियर की धारणा की सीमाओं और खामियों को उजागर करने, पब्लिक स्फियर में भागीदारी की समता की उनकी संकल्पना और ‘सबाल्टर्न काउंटरपब्लिक’ की उनकी अवधारणा के लिए भी जाना जाता है। 

इस घोषणापत्र में ये तीनों नारीवादी लेखक पितृसत्ता और पूंजीवाद की संरचनाओं पर गहरी चोट करती हैं और इनके विरुद्ध वैश्विक संघर्ष का आह्वान भी। वे एक हिंसाविहीन और शोषणमुक्त समाज की संकल्पना प्रस्तुत करती हैं और इस क्रम में उदारवादी नारीवाद (जिसे वे ‘कॉरपोरेट नारीवाद’ की संज्ञा देती हैं) को भी सिरे-से खारिज करती हैं और इसे नवउदारवाद का ही सहयोगी बताती हैं। पूंजीवाद, नस्लवाद और साम्राज्यवाद का मुखर विरोध इस घोषणापत्र के मूल में है। वे नारीवादी आंदोलनों को दुनिया भर में चल रहे अन्य रेडिकल आंदोलनों के साथ जुड़ने का प्रस्ताव रखती हैं। 

यह घोषणापत्र नारीवाद को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट, जीवनयापन की स्थितियों में आती गिरावट, युद्ध और विस्थापन, नस्लवाद जैसे गंभीर मुद्दों के प्रति भी अधिक संवेदनशील होने की मांग करता है। और इस तरह नारीवादी आंदोलन को सभी शोषित और दमित लोगों के संघर्षों के साथ एकजुट होने की वकालत करता हैं। यह नारीवाद रोज़मर्रा के अनुभवों और संघर्षों से अपने सैद्धांतिक निष्कर्ष जुटाएगा और पितृसत्ता व पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ते हुए सामाजिक न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य, श्रमिकों के अधिकार, पर्यावरण की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध होगा। 

इक्कीसवीं सदी का नारीवाद विश्व पर मँडराते हुए आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय संकट को उसकी संपूर्णता में देखने की कोशिश करेगा और वैश्विक पूंजीवाद और नवउदारवाद से संघर्षरत लोगों के साथ खड़ा होगा। इसके अनुसार यह संकट सिर्फ कष्ट सहने का समय नहीं है, बल्कि यह जागने का क्षण भी है और सामाजिक बदलाव और यथास्थिति को तोड़ने का अवसर भी। इसके अनुसार जेंडरसंबंधी हिंसा शारीरिक, भावनात्मक और सेक्सुअल आदि कई रूपों में प्रकट होती है और इसमें नस्ल, वर्ग, सेक्सुअलिटी और राष्ट्रीयताएँ भी अहम भूमिका निभाती हैं। 

इक्कीसवीं सदी का नारीवाद शोषण के इन सभी स्वरूपों से टकराने को प्रतिबद्ध होगी। वह चाहे राज्य और क़ानून द्वारा की जाने वाली हिंसा हो, या बाज़ार द्वारा की जाने वाली आर्थिक हिंसा हो, पर्यावरणीय हिंसा हो या पूंजीवादी संस्कृति की हिंसा हो। इस घोषणापत्र के अनुसार वर्तमान परिदृश्य में हिंसा अपने सभी स्वरूपों में कहीं-न-कहीं पूंजीवादी समाज से एकीकृत है और इसके जरिये पूंजीवाद सेक्सुअलिटी पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करता है। 

यह घोषणापत्र एलजीबीटी समुदाय के संघर्षों के साथ खड़ा होने और उनके अधिकारों की लड़ाई में नारीवादियों की भागीदारी को भी रेखांकित करता है। साथ ही, दुनिया भर नवसाम्राज्यवादी देशों द्वारा की जा रही हिंसा के विरुद्ध भी एकजुट होकर मोर्चा कायम करने की सलाह देता है। यह घोषणापत्र संकट के दौरान इस संघर्षको एक अवसर के रूप में और सीखने के एक मौके के रूप में देखता है और प्रतिक्रियावाद और नवउदारवाद के छद्म को तोड़ता है।


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