ग्रामीण इलाकों में लड़कियों द्वारा पढ़ाई छोड़ने के पीछे मूत्रालय और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है

By - हिंदी डाकिया

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फ़ोटो साभार - पत्रिका न्यूज़ 

भारतीय स्कूलों में पेयजल व शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की हालत   

एनसीईआरटी द्वारा 2009 में किए गए आठवें स्कूली शिक्षा सर्वे में भारत में प्राइमरी, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर स्कूलों की मौजूदगी और उनमें उपलब्ध सुविधाओं (मसलन, स्कूली इमारत, पेयजल, मूत्रालय और शौचालय आदि) के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। ये आँकड़े भारत के स्कूलों में स्कूली इमारत, पेयजल, मूत्रालय और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव को दर्शाते हैं। 2016 में प्रकाशित हुए इस सर्वे में 30 सितंबर, 2009 तक के आंकड़े शामिल हैं। स्कूली शिक्षा सर्वे अनुसार भारत में विभिन्न स्तरों के कुल 13 लाख स्कूल हैं, जिनमें से 84 फीसदी स्कूल (10,94,510 स्कूल) ग्रामीण इलाकों में और 16 फीसदी स्कूल (2,05,392 स्कूल) शहरी इलाकों में मौजूद हैं। 

स्कूली इमारतों की बात करें तो 97.2 फीसदी स्कूलों के पास पक्के भवन थे, जबकि 1.67 फीसदी स्कूल (यानी 21,710 स्कूल) कच्ची इमारतों में चल रहे थे। जबकि कुल स्कूलों के 1.07 फीसदी स्कूल यानी 13,910 स्कूल ऐसे थे जो बगैर किसी भवन के खुली जगहों पर या फिर टेंट आदि में चल रहे थे। राज्यवार देखें तो बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा सरीखे राज्यों में स्कूली भवनों के मामले में स्थिति सबसे बुरी थी। माध्यमिक स्कूलों की बात करें तो एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है कि बिना इमारत के चल रहे माध्यमिक स्कूलों की संख्या 2002 से 2009 के बीच बढ़कर 496 से 688 हो गई, जोकि बगैर इमारत के स्कूल में 31 फीसदी की बढ़ोतरी को दिखाता है। 

स्कूलों में पेयजल की उपलब्धता की बात करें तो 10.63 फीसदी स्कूलों (लगभग 1,38,190 स्कूल) में पीने योग्य पानी उपलब्ध नहीं था। ग्रामीण इलाकों में ऐसे स्कूलों का प्रतिशत और अधिक था, जहाँ पेयजल उपलब्ध नहीं था। ग्रामीण इलाकों में ऐसे स्कूलों की संख्या 1,48,200 (यानी 11.40 फीसदी) थी। शहरी इलाकों की बात करें तो 6.53 फीसदी स्कूलों (84,890 स्कूल) में पेयजल उपलब्ध नहीं था। 

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फ़ोटो साभार - बिहार लाइव

स्कूली सर्वे में मूत्रालय (यूरिनल) और शौचालय (लैवेटरी) की उपलब्धता के संबंध में भी जरूरी आँकड़े दिये गए हैं। इसके अनुसार कुल 13 लाख स्कूलों में मूत्रालय और शौचालय की उपलब्धता क्रमशः 77.28 और 72.86 फीसदी स्कूलों में थी। इसका दूसरा और दुखद पक्ष यह है कि 22.72 फीसदी (2,95,360 स्कूल) और 27.14 फीसदी स्कूलों (3,52,820 स्कूल) में क्रमशः मूत्रालय और शौचालय उपलब्ध नहीं था। 

लड़कियों के लिए अलग मूत्रालय और शौचालय की बात करें तो मामला और भयावह हो जाता है। जिन 12.75 लाख स्कूलों में लड़कियों का पंजीकरण हुआ था, उनमें से महज 62.26 और 55.17 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के अलग से क्रमशः मूत्रालय और शौचालय की व्यवस्था थी। मतलब यह कि 4,30,185 स्कूलों में लड़कियों के लिए मूत्रालय नहीं थे और लगभग 5,71,582 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं थे। 

ग्रामीण इलाकों में लड़कियों द्वारा पढ़ाई छोड़ने के पीछे मूत्रालय और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी निश्चित ही शामिल है। दूषित पेयजल पीने से होने वाली बीमारियों से स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति भी बुरी तरह प्रभावित होती है। 

यह पूरा सर्वे आप ऑनलाइन यहाँ पढ़ सकते हैं : पढ़िए





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