बेरोजगार महिलाओं की संख्या 62% से बढ़कर 65% हो गयी है


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फ़ोटो - टाइम्स नाउ हिंदी

लड़कियों तक शिक्षा की पहुँच बढ़ने के बाद भी तीस साल और उससे ऊपर के उम्र की महिलाओं का लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन लगातार घटते जा रहा है। 2012 से अभी की तुलना में पढ़ी लिखी लेकिन बेरोजगार महिलाओं की संख्या 62% से बढ़कर 65% हो गयी है। 

ऐसा क्या होता है तीस साल की उम्र के आसपास और उसके बाद जो डिग्री धारी, अल्प शिक्षित या अशिक्षित महिलाओं की कमाने की दर घट जाती है? 

बच्चा होता है, गृहस्थी आती है। लेकिन बच्चा अकेले का तो नहीं होता है। कुर्बानी अकेले क्यों दी जाती है? गृहस्थी दो लोगों की बसती है फिर नौकरी के साथ समझौता बस एक पक्ष ही क्यों करता है? 

इसके साथ ही अगर हम ओवरऑल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन की बात करे तो जहाँ वर्किंग पुरुष 82-83% हैं वहीं वर्किंग महिलाएं सिर्फ 27-28 प्रतिशत ही हैं। इसका मतलब कि अब लगभग हर किसी की बेटी पढ़ तो रही है लेकिन काम पर नहीं जा पा रही या कुछ जाने के बाद भी 'निजी' कारणों से छोड़ दे रहीं हैं। मतलब  लगभग सब की बेटी पढ़ तो रही है लेकिन शादी के बायोडाटा में बताने भर के लिए। बेटी पढ़ तो रही हैं लेकिन अपने बच्चे के स्कूल में एडमिशन के वक्त इंटरव्यू में अंग्रेजी में बात कर पाने के लिए, सोशल पार्टीज में बात कर पाने के लिए, अंदर बाहर का कागजी या रोजमर्रा के काम सोच समझ पाने के लिए। 


बेटी को पढ़ा तो रहे हैं लेकिन अच्छे स्टेटस का दामाद ढूंढ़ पाने के लिए, दहेज में मोल भाव कर पाने के लिए क्योंकि दहेज को सिरे से नकार पाने के लिए बेटी को दामाद के बराबर करना पड़ेगा वरना रिश्तों को खरीद बेच का कारोबार समझने वाले लोग कभी भी अपना मुँह फाड़ना नहीं छोड़ेंगे। पर अगर लड़की की पढ़ाई को परिवार वाले टोकेनिज्म जैसा इस्तेमाल करेंगे और सरकार शिक्षित महिलाओं के आंकड़ों पर सिर्फ गर्व करके वापस सो जाएगी तो बराबरी की ताक में चल रही लड़कियां बार बार मुंह की खाएंगी क्योंकि बराबर का मौका और डिग्री एक दूसरे का पर्याय नहीं होता है।

और हां, इसे पढ़ कर जिनके भी दिमाग में यह आ रहा है कि 'सब को काम करना जरूरी तो नहीं' या 'घर संभालना कोई छोटा काम तो नहीं' तो उनके लिए बस इतना कि अगर घर संभालना इतना ही महान, दैवीय, परोपकारी, आत्मा को तृप्त करने वाला काम है तो पुरुष इस खूबसूरत मौके से खुद को वंचित क्यों रख रहे हैं ?



नोट - ये लेखिका के अपने विचार है।




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