‘एंथ्रोपोसीन’ युग का आरंभ : पृथ्वी और मानव-जाति का इतिहास

By - शुभनीत कौशिक


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‘एंथ्रोपोसीन’ युग का आरंभ : पृथ्वी और मानव-जाति का इतिहास 

वर्ष 2009 में इतिहासकार दीपेश चक्रवर्ती ने ‘क्रिटिकल इन्क्वायरी’ पत्रिका में ‘एंथ्रोपोसीन’ युग और इतिहास के अंतरसंबंधों के बारे में एक विचारोत्तेजक लेख लिखा था। शीर्षक था, ‘द क्लाइमेट ऑफ हिस्ट्री’। इस लेख में दीपेश चक्रवर्ती ने एक इतिहासकार की दृष्टि से इस नए भूवैज्ञानिक युग के आरंभ के महत्त्व और इतिहास की विचार-प्रणाली और इतिहासलेखन पर इसके दूरगामी प्रभावों को रेखांकित किया था। ‘एंथ्रोपोसीन’ युग से तात्पर्य औद्योगिक क्रांति (अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध) के बाद के उस समय से है, जब मानव गतिविधियों ने पृथ्वी पर भूवैज्ञानिक बदलाव लाने शुरू किए। इस प्रक्रिया में मनुष्य ख़ुद एक भूवैज्ञानिक शक्ति बन गया और इस तरह एक नए भूवैज्ञानिक युग का सूत्रपात हुआ।
वैज्ञानिकों के अनुसार ‘एंथ्रोपोसीन’ का आरंभ ‘होलोसीन’ युग की समाप्ति का द्योतक है, और यह ‘चतुर्थ कल्प’ (प्लेस्टोसीन) और होलोसीन के बाद शुरू होने वाला भूवैज्ञानिक युग है। ‘एंथ्रोपोसीन’ युग की अवधारणा की परिकल्पना का श्रेय नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रसायनविद पॉल क्रत्जेन और समुद्र विज्ञानी यूजीन स्टोर्मर को जाता है। 
इन दोनों ने ही वर्ष 2000 में पहले-पहल ‘एंथ्रोपोसीन’ शीर्षक से एक लेख लिखा, जो ‘इंटरनैशनल जियोस्फीयर-बायोस्फीयर प्रोग्राम’ की पत्रिका में छपा था। दो साल बाद, पॉल क्रत्जेन ने विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नेचर’ में छपे अपने लेख ‘जियोलॉजी ऑफ मैनकाइंड’ में भी ‘एंथ्रोपोसीन’ युग की संकल्पना और मानव गतिविधियों से आते भूवैज्ञानिक परिवर्तनों के बारे में लिखा।
दीपेश चक्रवर्ती के अनुसार ‘एंथ्रोपोसीन’ युग की अवधारणा विज्ञान ही नहीं समाज-विज्ञान समेत ज्ञान के सभी इदारों पर दूरगामी प्रभाव छोड़ेगी। इतिहास के संदर्भ में बात करें तो ‘एंथ्रोपोसीन’ की धारणा प्राकृतिक इतिहास और मानव इतिहास के बीच के अंतर को खत्म कर देगी। ऐसा नहीं है कि भौगोलिक और प्राकृतिक इतिहास के महत्त्व को इतिहासकारों ने पहले न समझा हो। अनाल्स स्कूल का इतिहासलेखन, विशेषकर फर्नांद ब्रादेल की पुस्तकें जैसे ‘द मेडिटरेनियन एंड द मेडिटरेनियन वर्ल्ड’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। पर वहाँ भी प्राकृतिक इतिहास को अलग कालखंड (‘लॉन्ग द्यूरी’) में बांध देने की प्रवृत्ति रही है। 
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुए पर्यावरणीय इतिहासलेखन में भी मनुष्य और प्रकृति के अन्योन्याश्रित सम्बन्धों का इतिहास लिखने की कोशिश जरूर हुई, पर वहाँ भी मनुष्य को एक भूवैज्ञानिक शक्ति के रूप में नहीं देखा गया। ऐसी भूवैज्ञानिक शक्ति जो जलवायु परिवर्तन और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ जैसे भूवैज्ञानिक घटनाओं को अंजाम देने में सक्षम थी। 
‘ग्लोबल वार्मिंग’ की परिघटना की ही बात करें तो उन्नीसवीं सदी के आखिर में ही स्वीडिश वैज्ञानिक स्वांते आरेनियस, जोसेफ़ फूरियर और लुई अगासीज़ सरीखे ग्लोबल वार्मिंग के बारे में लिख रहे थे। पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की परिघटना को व्यापक स्वीकृति मिली बीसवीं सदी के आख़िरी दशकों में, जब वैश्वीकरण की प्रक्रिया पूरे विश्व में बड़े पैमाने पर फैली। यह भी प्राकृतिक इतिहास और मानव के प्रजातीय इतिहास के जटिल सम्बन्धों का एक उदाहरण है।  
पृथ्वी पर भूवैज्ञानिक बदलाव ला सकने वाली एक भूवैज्ञानिक शक्ति के रूप में मनुष्य की पहचान आधुनिकता व वैश्वीकरण के इतिहासों पर भी गहरा प्रभाव डालेगी। ‘एंथ्रोपोसीन’ युग की धारणा पूंजी के वैश्विक इतिहास और मानव के प्रजातीय इतिहास के बीच संवाद के महत्त्व को भी रेखांकित करती है। और आगे चलकर इससे इतिहास की समझ की हमारी सीमाएँ और संभावनाएँ भी पता चलेंगी।




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