बांग्लादेशी साबित होने के बाद बना भाजपा नेता की पत्नी का पासपोर्ट



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IPS अधिकारी के ‘प्रेशर’ में मालवणी पुलिस ने नहीं ली खुफिया पुलिस की शिकायत

मुंबई के दैनिक अखबार "जन स्वाभिमान"ने हाल ही में अपने अख़बार में एक ख़बर खुलासा किया है। जिसमें ये बताया गया है कि मुंबई के हाजी हैदर खान की पत्नी का पासपोर्ट गलत तरीके से बनाया गया है। इस ख़बर के सामने आने के बाद पुलिस खेमे में खलबली मच गई है। बता दे कि हाजी हैदर खान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुंबई के उपाध्यक्ष हैं और मौलाना आजाद अल्पसंख्यक आर्थिक विकास महामण्डल के चेयरमैन हैं।

पढ़िए पूरी खबर जन स्वाभिमान की स्टाइल में

‘जन स्वाभिमान’ के पास इस बात के समस्त प्रमाण मौजूद हैं कि रेशमा खान बांग्लादेशी नागरिक है।'

पूरी कहानी कुछ यूं है -

रेशमा खान ने पिछले साल पासपोर्ट बनवाने के लिए आवेदन किया था। रेशमा ने जो कागजात (खासकर जन्मतिथि प्रमाण पत्र ) जमा किये थे, उसके अनुसार वह मुंबई  के उपनगर मालवणी में रहती हैं और पश्चिम बंगाल की मूल निवासी हैं। मुंबई पुलिस की विशेष शाखा (जिसे खुफिया विभाग भी कहा जाता है ) के अधिकारी व्यक्तिगत रूप से (साधारणतया पुलिस पत्र लिखकर जानकारी मंगवाती है ) पश्चिम बंगाल के उस पते पर गए तो मालूम पड़ा कि रेशमा खान का बताया पता फर्जी है। उनके दिए कागजात फर्जी हैं।

रेशमा खान के बांग्लादेशी नागरिक साबित होने के बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के लिए विशेष शाखा के अधिकारी मालवणी पुलिस स्टेशन पहुंचे। अधिकारी पूरे दिन पुलिस स्टेशन में बैठे रहे, लेकिन वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक दीपक फटांगरे ने एफआईआर लेने से मना कर दिया। फटांगरे ने खुलकर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन इशारा किया कि उन पर ‘ऊपर’ से दबाव है। मुंबई पुलिस मुख्यालय में बैठने वाले एक आइपीएस अधिकारी का फटांगरे पर प्रेशर था।

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हाजी हैदर खान 

पुलिस पर दबाव की वजह बताते हैं कि रेशमा खान हाजी हैदर आजम खान की पत्नी हैं। हाजी हैदर खान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुंबई के उपाध्यक्ष हैं और मौलाना आजाद अल्पसंख्यक आर्थिक विकास महामण्डल के चेयरमैन हैं। वैसे हाजी हैदर खान को भी भलीभांति मालूम है कि उनकी पत्नी रेशमा खान बांग्लादेशी नागरिक हैं।

इससे बड़ी बात ‘जन स्वाभिमान’ को मालूम पड़ी है कि रेशमा खान से सम्बंधित कागजात मालवणी पुलिस स्टेशन से गायब हो गए / कर दिए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि 24 दिसंबर 1999 को अपहृत इंडियन एयरलाइन्स की उड़ान आईसी -814 के चार अपहतार्ओं के फर्जी पासपोर्ट मुम्बई में बने थे। तब इस सवाल पर मुंबई पुलिस के आला अधिकारी निरुत्तर हो जाते थे, क्योंकि उनको इस बात का भान नहीं था कि आतंकवादियों के पासपोर्ट बने कैसे ? लेकिन अब मुंबई पुलिस के आला अधिकारियों के पास क्या जवाब है, जब यह जानते हुए कि रेशमा खान बांग्लादेशी नागरिक है, उसका पासपोर्ट बनने दिया गया। उलट, मुंबई पुलिस की विशेष शाखा ने जब रेशमा खान के खिलाफ एफआईआर करनी चाही तो मालवणी पुलिस ने यह कहकर उन्हें भगा दिया कि उन पर ‘ऊपर’ से दबाव है।

इस बाबत संवाददाता ने मुंबई पुलिस के जनसम्पर्क अधिकारी मंजुनाथ सिंगे और रेशमा खान के पति हाजी हैदर आजम से प्रतिक्रिया लेनी चाही तो वे उपलब्ध नहीं हो सके। दोनों ने व्हाट्सएप्प पर भेजे सवाल (एसएमएस) का जवाब नहीं दिया।

मुंबई पुलिस का टेंशन न्यूज लीक कैसे हुई!


बांग्लादेशी महिला का पासपोर्ट कैसे बना, इसकी फिक्र नहीं...


उल्लेखनीय है कि जन स्वाभिमान ने 14 जनवरी २०१९ के अंक में बांग्लादेशी साबित होने के बाद भी बना भाजपा नेता की पत्नी का पासपोर्ट शीर्षक से एक न्यूज प्रकाशित की थी।  इस न्यूज से मुंबई पुलिस के कुछ अधिकारी, खासकर पुलिस मुख्यालय में बैठनेवाला एक अधिकारी (जिसका उपनाम छोटा रिचार्ज या बाल कलाकार है) कुछ ज्यादा ही चिंतित हो गया है। बताते हैं कि यह अधिकारी सम्बंधित विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को बुला-बुला कर अपनी चिंता व्यक्त कर रहा है। पूछ रहा है कि ये न्यूज आखिर लीक कैसे हुई? हालांकि यह अधिकारी, जो आईपीएस रैंक का है, उसे इस बात की थोड़ी भी चिंता नहीं हो रही है कि आखिर एक बांग्लादेशी महिला का पासपोर्ट बन कैसे गया। उस अधिकारी को शर्म भी नहीं आ रही है कि पुलिस वेरीफिकेशन में जब यह मालूम पड़ गया था कि रेशमा मैडम बांग्लादेशी हैं, तो फिर उसका पासपोर्ट कैसे बन गया! शर्म तो छोड़िए, इस अधिकारी को इस बात की जांच कराने की भी फिक्र नहीं है कि मालवणी पुलिस ने खुफिया विभाग के अधिकारियों की शिकायत या एफआईआर नहीं ली तो क्यों नहीं ली? किसके दबाव में नहीं ली? उसे बस फिक्र है तो इस बात की कि खबर लीक कैसे हो गई ?

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अपने कुछ अफसरों की ऐसी ही कमियों की वजह से पूरा पुलिस महकमा बदनाम है और नाकारा कहलाता है। ऐसी कई मिसालें होंगी, जहां ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिसवालों की मुस्तैदी के चलते अपराधी किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने से पहले ही पकड़ में आ जाते हैं, लेकिन कुछेक लापरवाह और बेईमान कर्मचारियों की चंद सिक्कों के लिए की गई गलतियों के भयंकर परिणाम भी सामने आते हैं। 1993 के मुंबई बम धमाके हों या कंधार विमान अपहरण कांड, इसकी मिसाल हैं। हद तो तब हो जाती है, जब सीनियर पुलिस अफसर ऐसे मामलों की जांच कर दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई करने और ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके उपाय करने के बजाय, खबर लीक कैसे हुई यह ढूंढ़ने में लग जाते हैं। मामला दबाने या किसी तरह रफा-दफा करने में जुट जाते हैं। भाजपा नेता की बांग्लादेशी पत्नी के पासपोर्ट वाले मामले में भी ऐसा ही हो रहा है।

इस पत्रकार को ऐसा ही अनुभव इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की एक खबर छापने पर भी हुआ था, जब आयकर विभाग का एक वरिष्ठ अधिकारी इस बात को लेकर बहुत परेशान हो गया था कि एक अत्यंत गोपनीय रेड की खबर मीडिया में कैसे लीक हो गई। खबर छपने के बाद उनकी नाराजगी से अंदाज लग रहा था कि शायद उन्हें उससे काफी नुकसान उठाना पड़ा था।


बांग्लादेशी महिला के पासपोर्ट वाली खबर के कारण भी हो सकता है, किसी अफसर का कुछ नुकसान हुआ हो! लेकिन सवाल ये है कि क्या किसी अफसर का निजी फायदा या नुकसान पूरे पुलिस महकमे, सरकार या फिर पूरे देश के फायदे-नुकसान से बड़ा है? सवाल मुंबई के पुलिस कमिश्नर संजीव जायसवाल और राज्य के पुलिस महानिदेशक दत्ता पडसलगीकर से भी है कि उन्हें इस बात की चिंता क्यों नहीं हुई कि एक बांग्लादेशी महिला का पासपोर्ट पुलिस वेरीफिकेशन में पास न होने के बावजूद बना कैसे? जबकि दोनों अधिकारी देश की शीर्ष खुफिया (देशभक्त) एजेन्सी रॉ और आईबी से ताल्लुकात रखते हैं/थे।









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