प्रियंका का सक्रिय राजनीति में कदम विपक्ष के लिए ख़तरे की घंटी है


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फ़ोटो साभार - टाइम्स नाउ

प्रियंका के स्वरुप में लौटती इंदिरा को देखकर हड़बड़ाए विपक्ष से पता लगता हैं की इंदिरा गांधी का राजनीति में क्या स्थान था। 1984 या आनिबानी के लिए भले ही उनको कोसा जाए लेकिन ये बात भी सही हैं कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी का एक बड़ा योगदान रहा हैं। आज प्रियंका के स्वरुप में उनके लौटने की खबर सुनकर एक तरफ काँग्रेस के खेमें में ख़ुशी का माहौल बना हुआ हैं तो वही विपक्षी दल खौफ़ में हैं। इसका कारण यह भी हैं कि बरसों से काँग्रेस समर्थकों की यह माँग रही हैं कि प्रियंका सक्रीय राजनीति में आ जाए क्योंकि केवल चेहरे से ही नहीं बल्कि उनके राजनितिक समझ से भी कई लोग उन्हें इंदिरा गांधी के रूप में ही देखते हैं।

प्रियंका की राजनीतिक समझ की बात करे तो कुछ खबरों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से लेकर राजस्थान की सरकार बनाने तक सभी निर्णयों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं। बताया तो यहाँ तक जाता हैं कि काँग्रेस के मुश्किल समय में अब भी समस्याओं का हल प्रियंका के दरवाज़े से होकर ही गुज़रता हैं। 2014 और 1999 ये दो ऐसे साल हैं जब प्रियंका के न चाहते हुए भी समर्थकों ने उनके नाम के पोस्टर कई जगहों पर लगा दिए थे। 

आज तक काँग्रेस की हर मुश्किल घड़ी में प्रियंका पर्दे के पीछे से ही सही लेकिन सक्रियता से पार्टी को मदद करती आई हैं अब जब वो खुलकर सामने आ रही हैं तो सोचिये पार्टी को इसकी कितनी मदद मिलेगी। हालाँकि ये बात सही हैं कि पूरी तरह से इंदिरा बनने और मोदी के साम्राज्य को बड़े पैमाने तक कम करने में अब भी उन्हें थोड़ा समय और लगेगा लेकिन इतना ज़रूर हैं कि राजनीति में उनकी सक्रियता से विपक्ष को एक बड़ा झटका लगने वाला है और शायद यही वजह हैं की उनके वेलकम में ही हर कोई हड़बड़ा गया हैं। आज जिस परिस्थिति से काँग्रेस पार्टी गुज़र रही हैं उसमें प्रियंका का राजनीति में सक्रिय होना बहुत ही ज़रूरी था। 

कुछ लोगों का मानना ये भी है कि महाराष्ट्र में राज ठाकरे को भी अलग होने के बाद इतनी ही सराहना मिली थी लेकिन वो बाळासाहेब ठाकरे नहीं बन पाए। मेरे हिसाब से राज ठाकरे को बाळासाहेब ठाकरे बनाने में पैसों की कमी पड़ गई, पहले चुनाव में जिस तरह की जीत उन्होंने कल्याण-डोम्बिवली और अन्य इलाकों में दर्ज की थी वो उनके क़ाबिलियत का प्रमाण था लेकिन राजनीति में एक लंबे समय तक सत्ता टिकाने के लिए आर्थिक रूप से मज़बूत होना बहुत मायने रखता हैं और वही एक कारण हैं जिसके चलते आज न केवल सिर्फ राज ठाकरे बल्कि अरविंद केजरीवाल भी उनके पहले चुनाव की तुलना में कमज़ोर नज़र आएंगे। लेकिन प्रियंका के मामले में ये बात बिलकुल नहीं हैं आर्थिक रूप से मदद के लिये उनकी पार्टी आज भी उनके साथ हैं और वो एक ऐसी पार्टी हैं जिसके पास चुनाव में खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा हैं । 











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