मायावती को उस नारीवादी नज़रिये से नहीं देखा जाता जैसा इंदिरा गांधी को देखा जाता है




फ़ोटो साभार - NDTV 

माना जाता है कि मायावती जी का सपना था कि वह भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाएं. लेकिन उनकी आर्थिक स्थितियां ऐसी नहीं थी कि वह इस सपने को पूरा कर पातीं. इसलिए वह अध्यापक बनीं. उन्होंने लॉ भी किया. अध्यापक बनने के बाद भी उनमें अधिकारी बनने का जुनून था. वह प्रशासनिक सेवा में जाकर समाजसेवा करना चाहती थीं.

स्थितियां तब बिल्कुल बदल गयीं जब उनकी मुलाकात कांशीराम जी से हुई. 1977 में एक तीन दिवसीय सम्मेलन में जब दलितों के लिए हरिजन शब्द प्रयोग किया जा रहा था तब मायावती ने उसका विरोध किया और इस शब्द को दलितों के लिए अनुचित और अपमानजनक बताया. कांशीराम वहां उपस्थित थे और वे इस बात से खासे प्रभावित हुए. 

कांशीराम एक दूरदर्शी नेता थे. उन्होंने मायावती जी के सपनो को विस्तार दिया और उन्हें भरोसा दिया कि एक दिन वह मुख्यमंत्री बनेगीं. तब ऐसे तमाम अधिकारी उनके अधीनस्थ होंगे जिनके जैसा वह बनाना चाहती हैं. भविष्य में ऐसा हुआ भी. मायावती , कांशीराम के भरोसे पर अपनी मेहनत और हिम्मत के बलबूते खरी उतरीं. 

मायावती महज़ 39 साल की उम्र में देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनी. 

उनके यहां तक पहुंचने का संघर्ष महज़ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं था. यह महिला और दलित होने की दोहरी मार झेलने वाले उस वंचित वर्ग का संघर्ष था जिसके उस दौर में सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की जरा भी गुंजाइश नहीं थी. वह इंदिरा गांधी की तरह मुंह में चांदी का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुई थी. वह उस वर्ग और पार्टी से थीं जिसने अपनी मज़बूत ज़मीन खुद तैयार की. बावजूद इसके मायावती को उस नारीवादी नज़रिये से नहीं देखा जाता जैसा इंदिरा गांधी को देखा जाता है. यह भारतीय नारीवाद की भारी विसंगति है जिसके मूल में जाति और वर्ग की विषमता का भेद समाहित है. 

मायावती के राजनीति सफर में अब तक तमाम खूबियां और खामियां शामिल रही हैं. खामियों को दरकिनार कर दिया जाए तो वह आज भी एक हाशियाकृत वर्ग के लिए उम्मीद हैं. उनके लिए आत्मविश्वास और संबल का प्रतीक हैं. यह यूँ ही नहीं है कि उनकी राजनीतिक रैलियां देश की सबसे बड़ी राजनीतिक रैलियों में शुमार हैं. 

आप मायावती के लाख विरोधी हों. उनसे चाहे जितनी और जिस तरह की भी असहमति रखते हों लेकिन वह बतौर सशक्त महिला भारतीय राजनीति का मज़बूत हस्ताक्षर हैं जिसे न आप मिटा सकते हैं न ही खारिज कर सकते हैं.




नोट - यह लेख प्रद्युमन यादव के फेसबुक वॉल से ली गयी है। लेखक स्वतंत्र विचारक है।







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