हम सभी को फ़िल्म 'An Insignificant Man' कई दफा क्यों देखनी चाहिए



फ़िल्म An Insignificant Man

हम राजनीति करने के जिस समय मे हैं वहां उसकी बुनियादी समझदारियाँ बन्द कमरों में रस्मो की तरह निभाई जा रही हैं । यह वो दौर नही है , जहाँ उस की सैद्धांतिक सच्चाइयां सड़क पर आ कर व्यवहार में आने का जतन कर रही हों। यह वो दौर है जब बड़ी पूंजी वाले राजनीतिक दल  उम्मीदवारों के चयन से ले कर चंदे का हिसाब तक कमरे के भीतर  चार लोगों के बीच हुई बैठकों मे कर देते  है, जहाँ देश का प्रधानमंत्री तक अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं के सवाल को न सिर्फ नजरंदाज कर देता है, बल्कि बाकायदे एक नियम बनाता है कि आगे से फिल्टर किये हुए सवाल ही लिए जाएंगे।

ऐसे दौर में इस फ़िल्म को बार बार देखना न सिर्फ हैरान करता है बल्कि यकीन दिलाता है कि कैसे इसी दौर में ही जन तंत्र को सड़क पर बुलंद करने की सफल कोशिशें की जा सकती  है। एक घण्टे कुछ मिनेट की इस फ़िल्म को देखना उन तमाम नकारात्मकताओं को हवा कर देगा जिनको ले कर सिस्टम से परेशान हर समझदार आदमी अपनी अकर्मण्यता को जस्टिफाई करता रहता है। यह फ़िल्म न सिर्फ़ आपकी किताबी कुलीनता पर चोट करती है, बल्कि राजनीति विज्ञान की कुछ ऐसी ठोस सच्चाइयां भी बता देती है जो अकादमिक दुनिया को भी हैरान कर देती है।

दरअसल यह एक फ़िल्म नही है। यह हमारे देश मे जारी राजनीति के दुर्घट काल मे एक नई तरह की राजनीतिक बुनावट का जीवन्त दस्तावेज है।  यह फ़िल्म सड़ांध मरती व्यवस्था को देखते हुए जीने को मजबूर  एक आम नागरिक की आत्मा पर एकांत में की गई चोट है। 


कई लोग यह समझते है कि यह फ़िल्म अरविंद केजरीवाल के बारे में है। ऐसा बिल्कुल नही है । यह फ़िल्म व्यवहार में लायी गयी राजनीति की वह सैद्धांतिक किताब है जिसे रजनी कोठारी जैसे समाज शास्त्रियों ने बहुत मेहनत से लिखा था। इसे देखते हुए आप अरविंद केजरीवाल के रूप में इस बात से तो उत्साहित होंगे ही कि कैसे एक पढा लिखा, सादगी से जीवन जीने वाला इस देश का आम आदमी यदि ईमानदारी से कोई लड़ाई लड़ने को ठान ले तो कोई भी मुकाम हसिल करना उसके लिए बड़ी बात नही है। इससे कहीं ज्यादा यह फ़िल्म आपको यह सिखाएगी कि नई तरह की राजनीति में सत्याग्रह किस तरह से हो सकता है? आन्दोलन की प्रकृति कैसी हो सकती है? कोई राजनीतिक दल मुख्य धारा में रह कर भी किस तरह से अपने राजनीति करने के तरीकों को ईमानदार रख सकता है। आप इस फ़िल्म को देखते हुए सिद्धांत की राजनीती की उन सीमाओं को भी समझेंगे जहाँ राजनीति हर उस क्षण की सच्चाई है , जिस क्षण वह हो रही होती है। 

भारत की राजनीति में बंद कमरे में होने वाली बैठकों ने भारत के नागरिक को राजनीति की आम सच्चाइयों से दूर कर दिया है। ऐसे समय मे यह चौंकाता है कि  एक ताजा उभरी पार्टी किस तरह से उम्मीदवारों के चयन के लिए कार्यकर्ताओं के बीच खुली बैठके करने लगती है। मोबाइल और लैपटॉप का प्रलोभन देने के इस दौर में  कोई पार्टी पानी और बीजेली बिल के दामों की बात करने लग जाती है। किस तरह किये जा रहे वादों की विश्वसनीयता को ले कर एक पार्टी के भीतर रात - रात भर बहस होती है, जिसमे इस देश के कई बेहतर दिमाग हिस्सा लेते हैं। नियॉन हिर्डिंग्स और थ्री डी अवतारों के इस दौर में कैसे कोई पार्टी रिक्शा ऑटो को अपने प्रचार का जरिया बनाती है। यह सब देखना न सिर्फ रोचक है बल्कि उनके लिए प्रेरणा भी है जो कम संसाधनों की बात कह कर अपने सपनों को मार रहे हैं।

तारीफ इस फ़िल्म को बनाने वाले की भी करनी चाहिए। उसने काल के सबसे कीमती हिस्से को इस सावधानी से हमेशा के लिए कैद कर लिया है कि यह फुटेज  बगैर ऊब दिए लम्बे समय तक नई तरह की राजनीति को प्रेरणा देंगे भले ही इसके किरदार बाद में अवसान ले लें।। फ़िल्म के आखिर में एक दृश्य है जहां अरविंद मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं वहीं योगेंद्र भीड़ में बेहद असमंजस में खड़े अलग-थलग दिखाई दे रहे हैं। यह सीन पॉलिटिक्स के पटल पर चस्पी एक सच्चाई है। दरअसल योगेंद्र यादव हमारी राजनीति की भीड़ का वह एकांत है, जहां उनका रहना उतना ही जरूरी है जितना उस एकांत की छाया में मंझ कर समय समय पर किसी अरविंद का बाहर निकल कर भीड़ में आना। यही अरस्तू के सिद्धांत  फिलॉसफिकल किंग' की असफलता भी है। नीरो की माँ से उसे कभी दर्शन शास्त्र इसीलिए नही पढ़ाया था क्योंकि वह जानती थी कि दार्शनिक हो कर राजा नही हुआ जा सकता। 2017 में आई यह फ़िल्म बनावट के लिहाज से सुंदर है। जिन्होंने नही देखी है उन्हें देखनी चाहिए। जो लोग देख चुके हैं, उन्हें फिर से देखनी चाहिए।





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