चंदा मांगने वाली पार्टी के पास 1700 अनऑथराइज्ड कॉलोनियों के विज्ञापन देने के पैसे कहाँ से आये?

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पहले विकास कार्य सम्पन्न तो हो जाने दीजिए आम आदमी के पोस्टर ब्वॉय!

नाली- सड़क बननी शुरू हुई नहीं कालोनियों की सड़कों पर सीवर का पानी अभी भी बह रहा है नालियां अभी भी बजबजा रही हैं, लेकिन केजरीवाल के पोस्टर चमकने शुरू हो गए हैं.

केजरीवाल ने टॉइम्स ऑफ इंडिया में अनऑथराइज्ड कालोनियों में हो रहे विकास कार्यों का विज्ञापन फुल पेज पर अंग्रेजी में छपवाया है.

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इन अनऑथराइज्ड कालोनियों में कितने लोग अंग्रेजी पढ़ने वाले हैं? टॉइम्स ऑफ इंडिया की कितनी कॉपीज् इन अनॉथराइज्ड कालोनियों में बिकती है? ये भी एक सवाल है. लेकिन इस सवाल से बड़ा सवाल ये है कि सारी कालोनियों को एक ही पेज में शुभकामनाएं क्यों नहीं दे दी गई ? ओखला को शुभकामना देने के लिए अलग पेज, सीमापुरी के लिए अलग, कृष्णा नगर के लिए अलग. 
  • दिल्ली में 1700 अनऑथराइज्ड कालोनियां हैं तो पोस्टर छपवाने के लिए चंदा मांगने वाले केजरीवाल कितना बड़ा बजट लेकर बैठे हैं. 
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हर एक कॉलोनी के लिए एक अलग फुल पेज का एडवर्टीजमेंट. कालोनियों में अंग्रेजी के पाठक और अलग कॉलोनी के लिए अलग पेज, अगर इन दोनों सवालों को जोड़ दीजिए.

तो आप समझ पाएंगे कि ये पूरी कवायद अखबार को विज्ञापन के बहाने ब्राइब करने की है. अखबार को दो-तीन फुल पेज के सरकारी विज्ञापन मिलेंगे तो अखबार भी सरकार की पॉजिटिव खबरें छापेगा.

इस तरह से भ्रष्टाचार विरोधी आम आदमी के केजरीवाल  विज्ञापन के बहाने रिश्वत देकर अखबार की कवरेज को अपने पक्ष में झुकाना चाहते हैं. 

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अगर सरकार का काम होगा तो दिखेगा, अनऑथराइज्ड कालोनियों में इतनी समस्या है, कालोनियों में अगर आग लग जाती है तो फॉयर ब्रिगेड व्हीकल पहुंच नहीं पाती, पते को वैधता नहीं, सम्पत्ति की रजिस्ट्री होती नहीं, डरा धमका कर अवैध कब्जे होते रहते हैं. 

अब जब सरकार के जब पांच साल होने को हैं तो नाली और सड़क बनाने को समस्या का समाधान बताया जा रहा है. नाली-सड़क तो पहले से भी बनते रहे हैं, लेकिन वादा तो केवल नाली-सड़क बनाने का नहीं था केजरीवाल जी.


नोट - यह लेख दीपांकर पटेल फेसबुक वॉल से उनकी परमिशन से ली गई है।  







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