मेरा खुद का भाई CRPF में है, आज के हमले के बाद दिल कांप गया था


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मेरा खुद का भाई CRPF में है और अपनी पहली पोस्टिंग के तहत जम्मू-कश्मीर में ही तैनात है. आज जब आतंकी हमला और उसमें जवानों के शहीद होने की खबरें आई तो एक वक्त को दिल कांप गया. ऑफिस में ही था तो ब्रेकिंग छोड़कर सबसे पहले उसे फोन मिलाया. हाथ कांप रहे थे फोन मिलाते वक्त और दिल घबरा रहा था घंटी बजने तक. लेकिन इसे खुशकिस्मती कहें या भगवान का शुक्र, उसने फोन उठाया. मैंने अपनी आवाज को संभाला ताकि उसे ये ना लगे कि मैं बहुत ज्यादा परेशान हूं लेकिन वो भांप गया. 

इसलिये मुझे टेक्निकलिटी समझाने लगा कि ऐसा हुआ होगा, वैसा हुआ होगा और अंत में दिलासा भी कि चिंता की कोई बात नहीं वो सेफ है और बिल्कुल ठीक है. मुझे उसके टेक्निकल बातों से ज्यादा लेना-देना नहीं था लेकिन उस समय उसकी आवाज मुझे सुकून दे रही थी. लग रहा था कोई बड़ा हादसा टल गया. लग रहा था जैसे अभी-अभी कोई ऐसा तूफान गुजर गया हो, जो सब कुछ तहस-नहस कर सकता था. 

ये हम कैसे माहौल में जी रहे हैं ? एक तरफ जब पूरी दुनिया मोहब्बत का त्यौहार मना रही है, हमारे जवान किसी के नफरतों का शिकार बन रहे हैं. एक तरफ जब पूरी दुनिया शांति और सुकून से जीने के लिये जद्दोजहद कर रही है, हम अपने जवानों को सुरक्षा देने में फेल हो रहे हैं. क्या इस देश को इजरायल बनने की जरूरत नहीं है? क्यों एक-दो जवान की मौत की खबरों के हम अभ्यस्त हो चुके हैं ? क्या जवान हमारे लिये सिर्फ संख्या बन कर रह गये हैं ? क्या अब जवानों की मौत की संख्या देखकर हमारा खून खौलेगा ?

मेरा सवाल अपने कुछ पत्रकार मित्रों से भी है. जो कश्मीर जाकर वहां के लोगों के दुख-दर्द लेकर आते हैं, क्या आपने कभी उन लाखों परिवारों के दुख-दर्द को महसूस किया है, जिनके घर का कोई परिवार उन्हीं कश्मीरियों की नफरत का शिकार बन रहा है? क्या फिल्म सिटी की चाय पर चर्चा करते हुए उन जवानों के प्रति आपके दिलों में सहानुभूती उपजी है, जो अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर मौत के साये में जिंदगी काट रहे हैं. 

अगर नहीं तो आप बीमार हैं. तथाकथित ऑब्जेक्टिविटी ने आपको अंदर से खोखला कर दिया है. आपको सोचने और समझने की जरुरत है कि जवानों के भी मानवाधिकार होते हैं, उनका भी परिवार होता है. जिसका कश्मीर से आ रही खबरों को देखकर दिल बैठ जाता है. जो रोज भगवान से एक ही दुआ करता रहता है, बस आज का दिन ठीक बीत जाये.


यह पोस्ट विवेक सिंह की फेसबुक वॉल से ली गयी है। विवेक ज़ी मीडिया में बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर काम करते है। 









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