बंगाल के महायुद्ध में सीबीआई अपनी विश्वनीयता खो चुकी है


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सवाल तुझ पर भी हैं सवाल मुझ पर भी हैं
फ़र्क सिर्फ़ इतना हैं हम दोनों में साहिब
तेरा स्वार्थ दांव पर लगा हैं और मेरा ईमान......

देश के बड़े से बड़े मामले में जब लोगों का विश्वास पुलिस से उठ जाता हैं तो वो एक ही मांग करते हैं की इसकी सीबीआई जाँच होनी चाहिए। वो ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि ये एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम करनेवाले संगठन के नाम से जानी जाती हैं लेकिन आज जब उसी सीबीआई के अफसर को पुलिस कॉलर पकड़कर घसीटते हुए पुलिस थाने ले जाती हैं और उसी पर पक्षपात का आरोप लगाती हैं तो क्या वो संस्था विश्वसनीयता के क़ाबिल बचेगी। कल कोलकाता में जो कुछ हुआ वो सब कुछ भारत के इतिहास में पहली बार ही हो रहा था लेकिन फिर सवाल ये उठने लगे की इसमें गलत कौन हैं सीबीआई या ममता।

देश के इतने बड़े आईपीएस अफसर को गिरफ्तार करने सीबीआई बिना वारंट कैसे पहुँच सकती हैं लेकिन कानून की माने तो ये अधिकार उन्हें हैं। ये अधिकार वो केवल तब इस्तेमाल कर सकते हैं जब उनके पास इस बात के सबुत हैं की वो अफ़सर या तो भागने की फ़िराक़ में हैं या वो सुबूतों को नष्ट करने की कोशिश कर रहा हैं। सीबीआई ने साफ़ तौर पर बता दिया की कई पत्रों के भेजने के बावजूद कमिशनर साहब ने सीबीआई के साथ जाँच के लिए सहयोग नहीं किया और इसी बात को इसका प्रमाण मान लिया गया की कमिशनर साहब भाग सकते हैं क्योंकि वो इमानदारी से जाँच में सहयोग नहीं कर रहे थे। अब कमिशनर साहब की माने तो एक पत्र का जवाब उन्होंने भी दिया था जिसमे उन्होंने छुट्टी पर होने की बात कही और बताया था की छुट्टी पर होने के चलते वो जाँच के लिए नहीं आ सकते।

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Photo credit - Epostmortem

अब जब कमिशनर साहब के व्यवहार से त्रस्त होकर सीबीआई खुद उन्हें गिरफ्तार करने पहुँची तो ममता दीदी ने उन्हें ही उठा लिया और फिर मामला गया सुप्रीम कोर्ट में। हालाँकि सीबीआई अफसरों को बाद में छोड़ दिया गया लेकिन उस बीच जो कुछ भी हुआ वो भारत के लिए इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया। आज जब सुप्रिम कोर्ट ने सीबीआई का एप्लीकेशन लिया तो साफ़ साफ़ शब्दों में कह दिया इस एप्लीकेशन के मुताबिक कोर्ट को कही भी ऐसा नहीं लगता की कमिशनर साहब सबुत को मिटा रहे हैं या फिर भागने की फ़िराक़ में हैं। कोर्ट के ऐसा कहने की वजह ये थी की कमिशनर साहब के खिलाफ पर्याप्त सबुत सीबीआई ने कोर्ट में पेश ही नहीं किये और यहाँ आता हैं सीबीआई के अधिकार का मामला क्योंकि यदि उनके पास पर्याप्त सबुत नहीं थे फिर वो बिना वारंट के कमिशनर को गिरफ्तार करने कैसे पहुँच गए और यदि सबूत थे तो वो कोर्ट में क्यों पेश नहीं किये गए ख़ास तौर से तब जब पूरी संस्था की इज़्ज़त दांव पर लग गई हो। खैर कोर्ट ने अब मामले को कल पर ढकेल दिया हैं और इसका फैसला कल होगा की सीबीआई के पास सबूत हैं भी या वो सिर्फ़ केंद्र के तोते के तौर पर काम कर रही थी।


इस बीच ममता दीदी ने धरना दे दिया हैं और संविधान बचाओ,लोकतंत्र बचाओ से लेकर देश बचाओ तक की माँग तक पहुँच गई हैं। लेकिन इस धरने के साथ एक सवाल उनके पक्ष की और से ये भी आया हैं की तृणमूल के दो पूर्व नेता जो फिलहाल भाजपा के साथ हैं उन्हें सीबीआई ने अब तक हिरासत में क्यों नहीं लिया। सवाल में दम इसलिए भी हैं क्योंकि इस पुरे केस में वो दोनों मुख्य आरोपी माने गए थे जिनकी भाजपा में प्रवेश के बाद से कोई जाँच नहीं हुई तो फिर सीबीआई यदि पक्षपात नहीं हैं तो पहले गिरफ्तारी उनकी होनी चाहिए थी। एक और मज़ेदार बात ये भी हैं की कुछ चार-पाँच महीने पहले इन दोनों में से एक यानिकि मुकुल रॉय का एक कॉल रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया में वायरल होने के साथ खबरों में भी छप गया था जिसमें वो बीजेपी के नेता कैलाश विजयवर्गीय को यह कह रहे थे की कैलाश सीबीआई से कहकर कोई चार आईपीएस अफसरों को डराये। जिनमें से दो को नाम वो भेज भी देंगे अब ये चार आईपीएस अफसरों का कोलकाता के कमिशनर साहब से कितना कनेक्शन हैं ये तो वो ही बता सकते हैं लेकिन केवल चार-पाँच महीने बाद इस तरह का एक्शन उस कॉल रिकॉर्डिंग से तार ज़रूर जोड़ सकता हैं।

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इस पुरे मामले में यदि किसी की इज़्ज़त दांव पर लग गई हैं तो वो हैं सीबीआई क्योंकि ममता तो वैसे भी बड़ी हो गई हैं। विपक्ष के हर एक बड़े नेता ने ममता के साथ खड़े होने की बात भी कही और उन्हें पूरी तरह से समर्थन देने को भी तैयार हो गए जिसके चलते वो एक बार फिर राहुल गांधी से बेहतर प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के रूप में उभर कर आ सकती हैं। सीबीआई के मुखिया को लेकर चले लंबे बवाल के बाद ये मामला सीबीआई की विश्वसनीयता पर एक बड़ा संकट लेकर आया हैं। आज आम आदमी से लेकर बड़े से बड़े पद पर बैठे अफ़सर तक यही आरोप कर रहे हैं की सीबीआई जैसी संस्था का इस्तेमाल केंद्र सरकार अपने हिसाब से कर रही हैं जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं।

इस महायुद्ध में जीत भले किसी की भी हो लेकिन एक बात तय हैं की सीबीआई अपनी विश्वसनीयता खो चुकी हैं। वो आम आदमी जो पहले सीबीआई से अंतिम जाँच करवाने की माँग करता था वो अब इस बात की माँग करने से पहले हज़ार बार सोचेगा। राजनीति आज भले ही संपूर्ण देश को गंदा कर रही हो लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के खातिर राज्य का स्वाभिमान मानी जानेवाली संस्थाओं को बचाना जनता की ज़िम्मेदारी हैं और उसके लिए उन्हें इस गंदगी की वजह को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा फिर वो चाहे किसी भी खेमे से क्यों न हो।



By - अली शेख (आज़द पत्रकार)










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