एक नेहरू, एक गांधी, एक टैगोर पैदा करने में एक सदी लग जाती है


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जब भी उत्तर भारत से इतर कोई संवैधानिक संकट होता है. कोई दंगा होता है. कोई राज्य सरकार तानाशाही करती है. कोई नेता कुछ ऐसा बोलता है जो शायद देश की एकता-अखंडता के लिए सही नहीं है. 

जब भी भाषाई अस्मिता की बात होती है. तब उस वक्त प्रतिक्रियास्वरुप हम यानी उत्तर भारत के लोग तपाक से ये क्यों कहने लगते हैं कि उन्हें अपना अलग देश चाहिए? वीज़ा लेना पड़ेगा. टाइप..टाइप. पश्चिम बंगाल में संवैधानिक संकट हुआ. राज्य और केंद्र सरकार के बीच सीधे-सीधे लड़ाई है. 

संघीय व्यवस्था को लेकर सवाल हैं. दुनिया के हर मुल्क में उठते हैं. यहां यानी भारत में पहले भी उठते रहे हैं. लेकिन पूरी जिंदगी पत्रकारिता करने के बाद आप इस मुद्दे पर ये बोलें, 'दीदी वीजा कहां से मिलेगा बता दीजिए.' तो ये क्या है ? आप क्यों ऐसे कहते हैं. हां, इसमें कोई संशय नहीं है कि उधर के चंद लोग इसे आपसे भी पहले कहते हैं. लेकिन ऐसे चंद लोग भारत के हर हिस्से में हैं. और रहेंगे. पहले भी थे.

मैं 'स्ट्रेचियन विचार' (भारत कभी एक मुल्क बनकर नहीं रह सकता) को हमेशा खारिज करते आया हूं. धार्मिक दंगे हुए. भाषाई आंदोलन हुए. इस सबके बाद भी हम एक ही रहे. कभी कोई ऐसा बड़ा आंदोलन (पाकिस्तान को छोड़कर) नहीं हुआ जिसमें सिर्फ अलग देश की मांग की गई हो. छुटपुट तो होती आई हैं, कभी-कभी औसत भी. 

एक 5000 साल पुरानी सभ्यता वाले देश का इतना करना तो बनता है. हां, तो सवाल वही है कि आप उन सभी घटनाओं को उसी तरह क्यों नहीं देखते जैसे उत्तराखंड में हो रहे संवैधानिक संकट को देखते हैं. सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े पत्रकार दो दिन से लगाए हैं ममता बानों का पश्चिम बंगाल एक देश है. क्या लॉजिक है इसका. 

देश में जब संविधानसभा संविधान का निर्माण कर रही थी वो वक्त बड़ा उथल-पुथल भरा था. देश में दंगे हो रहे थे. अराजकता फैली थी. इसलिए संविधान सभा ने केंद्र को ज्यादा शक्तियां दीं. 

इसलिए हम संघीय होते हुए भी केंद्रीय व्यवस्था हैं.  तो राज्यों को दिक्कत तो होती ही है. मोदी जी को भी होती थी, जब गुजरात में थे. दूसरे भारत के राज्य भी यूरोप के दो-दो देशों के बराबर हैं. इसलिए इतना चलने दीजिए. चलना चाहिए. 

कोई लोकतंत्र बर्बाद नहीं हो गया. देखिए, मोदी जी लद्दाख की हंसी वादियों में घूम रहे हैं. वो जानते हैं, एक्चुअली जानते ही नहीं वो करते भी रहे हैं. इस तरह 'अलग देश चाहते हैं', जो आप कहते हैं ना सच में वो बहुत खतरनाक है. बहुत ज्यादा. इस चक्कर में पढ़े लिखे लोग भी राज्य की अस्मिता को लेकर कट्टर होते जा रहे हैं. 

बड़ी मुश्किल से हमने पश्चिमी दुनिया के आधे से ज्यादा या फिर सभी भाषाई, सामाजिक, राजनीतिक वैज्ञानिकों के इस भ्रम को तोड़ा है कि हम एक देश के तौर पर नहीं रह सकते. उन्हें सफल मत होने दीजिए. 

एक नेहरू, एक गांधी, एक टैगोर पैदा करने में एक सदी लग जाती है. उनके सपनों का भारत है ये, इसे यूं ही तोड़ने की बातें मत करना लगा कीजिए.




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