क्या पाकिस्तान मोदी को चुनाव जितवाना चाहता है?


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पुलवामा आतंकी हमले की टाइमिंग हैरान करने वाली है

पाकिस्तान कभी भी भारत को एक मजबूत सेक्यूलर राष्ट्र देखना नहीं चाहेगा. धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित भारत का संवैधानिक लोकतंत्र पाकिस्तान के जन्म की बुनियाद को चुनौती देता है. पुलवामा मे हुये आतंकवादी हमले की तह में भी पाकिस्तान की भारत के संवैधानिक लोकतंत्र को चोट पहुंचाने की मंशा झलकती है. लेकिन अपनी इस खीज को मिटाने के लिये पाकिस्तान किस हद तक जाएगा ये बात हैरान करने वाली है.
मौजूदा हमले में पाकिस्तान के हाथ और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की शह पर पल रहे जैश-ए-मोहम्मद की पैदाइश और उसके मकसद को समझना होगा और भारत के खिलाफ उसकी साजिश के तार कहां कहां जुड़ते हैं इसे पड़ताल करना ज़रूरी है. इसके लिये दिसंबर 1999 में काठमांडू से दिल्ली आ रहे इंडियन एयरलाइन्स के विमान IC 814 के आतंकवादियों द्वारा अपहरण किए जाने के घटनाक्रम के कुछ पहलुओं को पलट कर देखना होगा.
केंद्र में उस वक़्त अटल बिहारी वाजपेयी की बीजेपी और उसके घटक दलों की सरकार थी. अमृतसर में विमान को रोकने पर अटल सरकार की मुश्किलें बढ़ गयीं थी और 176 यात्रियों के साथ विमान तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान के कंधार हवाई अड्डे पर उतारा गया था. मीडिया में फंसे हुये यात्रियों के रिश्तेदारों के रोते बिलखते चेहरों ने घरेलू दबाव बढ़ा दिया था और अंतत: वाजपेयी सरकार को जम्मू में बंद मसूद अज़हर को दो और आतंकवादियों के साथ छोड़ना पड़ा था. आतंकवादियों को यात्रियों के बदले छोड़ने का समझौता उस वक़्त के इंटेलीजेंस ब्यूरो के अफसर और कंधार में तालिबान के साथ बातचीत कर रही भारतीय टीम की अगुवाई कर हे अजित दोभाल के साथ हुआ था. अटल सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह विशेष विमान में मसूद अज़हर को कंधार तक छोड़ने गए थे.
कंधार में छूटते ही मसूद अज़हर को आईएसआई के सुरक्षा घेरे में कंधार से पाकिस्तान तक पहुंचा जहां उसने अगले ही साल यानि जैश-ए-मुहम्मद का गठन किया. जैश-ए-मुहम्मद का गठन करते ही अक्तूबर 2001 में उसने जम्मू कश्मीर की विधान सभा और दिसंबर 2001 में संसद भवन पर फिदायीन हमले कराये.
लश्कर-ए-तैयबा पर किताब लिख चुकी जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की असोसिएट प्रोफेसर क्रीस्टीन फेयर लिखती हैं कि पाकिस्तान के उनके सूत्रों ने 2014 में उन्हे बताया था कि जैश एलओसी के आस पास अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है और 2016 में पठानकोट के एयरफोर्स बेस पर आतंकवादी हमला कर के मसूद अज़हर का जैश कश्मीर में पाकिस्तान की आईएसआई का सबसे विश्वासपात्र मोहरा बन गया.

पुलवामा हमले की टाइमिंग पर उठते सवाल:

प्रोफेसर क्रिस्टीन फेयर ने द क्विंट में लिखते हुये कहती हैं कि पुलवामा हमले की टाइमिंग हैरान करने वाली है और साफ इशारा कर रही है कि भारत के लोकसभा चुनाव को आईएसआई प्रभावाइट करना चाहती है. हमले से पाकिस्तान के मंसूबे साफ दिखते हैं पाकिस्तान मोदी को सत्ता में बनाए रखना चाहता है. कश्मीर में ये हमला उस वक़्त किया गया है जब मोदी की राजनीतिक स्थिति कमजोर पड़ रही थी. क्रिस्टीन का मानना है कि पाकिस्तान अपने देशवासियों को ये संदेश देना चाहता है कि भारत में मुसलमान कितने असुरक्षित हैं और मोदी का सत्ता में बने रहना उसके इस मंसूबे को पुख्ता करता है.
  • क्रिस्टीन के मुताबिक पुलवामा में हमला करके राजनीतिक कठिनाई में पड़े मोदी को अपने एजेंडे पर आने का मौका दे दिया है और मोदी के पास पाकिस्तान की इस चालाकी भरे खेल में न घिरने के कम विकल्प हैं. 

रक्षा मामलों पर कॉलम लिखने वाले सीनियर जर्नलिस्ट अजय शुक्ला ने भी एक ट्वीट के जरिये हमले की टाइमिंग पर सवाल उठाया है कि क्या पाकिस्तान की आईएसआई मोदी को चुनाव जितवाना चाहती है. सुरक्षा में हुई चूक पर टाइमिंग का सवाल ममता बनर्जी ने भी उठाया है. 

पुलवामा के पहले और बाद की राजनीति:

14 फरवरी को पुलवामा में आतंकवादी हमले में मारे गए 42 सीआरपीएफ़ के जवानों की घटना से पूरा देश स्तब्ध है. विपक्ष सरकार के साथ खड़ा है और अभी तक उनसे मोदी सरकार पर हमले को रोक पाने में विफल रहने पर भी राजनीतिक हमला नहीं किया है. 14 फरवरी से पहले मोदी राजनीतिक रूप से पूरी तरह से घिरे हुये थे. उत्तरप्रदेश में एसपी-बीएसपी गठबंधन बड़ी चुनौती के रूप में दिख रहा था. राफेल, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी के बैंको का हजारो करोड़ हड़प कर भाग जाने जैसे कई भ्रष्टाचार के मुद्दों, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के सवाल मोदी और बीजेपी के प्रवक्ताओं को परेशान कर रहे थे. यूनिवर्सिटीज़ में 13 पॉइंट रोस्टर जैसे फैसलों पर दलित और पिछड़ा वर्ग गुस्से में था. पुलवामा ने एक झटके में इन मुद्दो की जान निकाल दी. मोदी जिस तरह हमले के बाद इसे राजनीतिक मुददा बना कर ताबड़ तोड़ रैलियां कर रहे हैं और उनके समर्थक देश में कई राज्यों में रह रहे कश्मीरियों को निशाना बना रहे हैं उससे क्रिस्टीन की बात वजनदार साबित हो रही है.
पुलवामा अगले कुछ सप्ताह में होने वाले चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बन पाता है या नहीं और इससे मोदी और बीजेपी चुनाव में कितना फायदा मिलता है ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी लेकिन जिस तरह से नफरत की राजनीति शुरू हो गई है और कश्मीरियों, पत्रकारों और सिविल सोसाइटी के लोगों को निशाना बनाया जा रहा उससे एक बात तो साफ हो गई है कि भारत की राजनीति को प्रभावित करने की अपनी चाल में पाकिस्तान कामयाब हो गया है. देश के संवैधानिक लोकतंत्र के लिये ये प्ररीक्षा की घड़ी है.

नोट: क्रिस्टीन फेयर के लेख का - लिंक पर क्लिक करें.

यह लेख प्रशांत टंडन की फेसबूक वाल से ली गयी है। 



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