मां अब भी बच्चे को अपना दूध पिलाती है


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फेल होना या हार जाना क्या है ? हम स्वीकार कर लेते हैं- हम फेल हैं. जैसे दुनियां का हर इंसान सोचता है कि वो सबसे ज्यादा दुखी है. इसको ऐसे भी कह सकते हैं- सबको लगता है सामने वाला ही बेहतरीन जिंदगी जी रहा है. 

बिल्कुल वैसे ही जैसे हर धर्म के कट्टरपंथी सोचते हैं- उनका धर्म सबसे बेहतर है. 

ऐसे ही असफलता भी हमारे दिमाग में एक स्पेस क्रियट करती है. हम किसी की एक ना को खुद की अयोग्यता करार दे देते हैं. जबकि हो सकता है उन चंद मिनटों में आपकी योग्यता आंकने की योग्यता ही सामने वाले में ना हो.

अटल जी कहा करते थे- हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा. अगर वो हार मान लेते तो आगरा के मामूली टीचर का लड़का जो शौकिया तौर पर पत्रकारिता करने लगा था, प्रधानमंत्री बन जाता ? जबकि पहली बार उनकी पार्टी 2 सीटें जीती थी. 

काफ्का अपने दर्द से हार मान लेता तो..? गांधी सांप्रदायिक शक्तियों से हार मान लेते तो…? 

जेपी इंदिरा से हार मान लेते तो...? संघ कांग्रेस से हार मान लेता तो...? स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ने वाले लिंकन संघर्ष से हार मान लेते तो...? 

ऐसे पचासो उदाहरण मैं दे सकता हूं, जिन्होंने चंद रुकावटों को हार न मानकर उन्हें सीढ़ी माना. जब हम इसे फेल्योर या रिजेक्शन का नाम देकर खुद को कम समझने लगते हैं, हार तब शुरु होती है.

पाओलो कोएलो की अल्केमिस्ट का गड़रिया तो रेगिस्तान के कण-कण में खुद को समा देता है, और मोक्ष पा लेता है. विश्वास की बदौलत. प्यार की बदौलत.  

रेगिस्तान की औरतें जब प्यार में इंतजार करती हैं, तो भरी दोपहरी में भी बारिश हो जाती है. वो हारी हुई बाजी भी अपने महबूब को जिता देती हैं.  तुम्हारे लिए तो उस खुदा के सज़दे में हर वक्त कोई दुआ कर रहा होता है.

तुम कैसे हार सकती हो ? और जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन नकार दूंगा खुदा के वज़ूद को.

तब उसकी बरकत में नेमतें करने की बजाय उसे चैलेंज करते हुए कहूंगा- मैं तेरे वज़ूद को ख़ारिज़ करता हूं. मैं तेरी पाक कुरान को मामूली पुस्तक बताता हूं. 

आज से ‘खुदा’ मेरे सिर्फ एक शब्द है, और तेरी दरगाह ईंट-रोड़ों का बना हुआ भवन.

मैं जानता हूं, ये दिन कभी नहीं आएगा. क्योंकि हवा अभी भी चल रही है. बेटा मां-बाप का अब भी लिहाज़ करता है. बच्चे को मां अभी भी अपना छातियों का दूध पिलाती है.  इसका मतलब है अभी भी सृष्टी वैसे ही चल रही है जैसे ईश्वर चाहता है.



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