मौसी माँ की सिंगारदानी by ट्विंकल तोमर सिंह




मौसी माँ की सिंगारदानी


मौसी माँ की सिंगारदानी मुझे आज तक याद है। एक लकड़ी का नक्काशीदार छोटा सा डिब्बा था, जिसमें एक बिंदी का पत्ता, एक सिंदूर की डिबिया, एक वैसलीन की डिब्बी, एक कंघा, एक छोटा सा गोल शीशा, कुछ चूड़ियां और कुछ रबरबैंड पड़े रहते थे।

मौसी रोज सुबह नहा धो कर, भीगी हुई अलकों से पानी की बूंदे गिराती, पूजा पाठ करके इस छोटी सी सिंगारदानी को खोलती थीं, तब मैं सम्मोहित सी उनके पास बैठ जाती थी। बड़ी हसरत से इस पिटारी को मैं ताकती थी। सोचती थी बड़े होकर मैं भी ऐसी ही एक पिटारी लूंगी। पर उसमें लिपस्टिक, नेलपॉलिश ,काजल भी होगा। मौसी पिटारी से बिंदी का पत्ता निकाल कर माथे पर लाल बिंदी लगाती, लगता था जैसे आसमान में पूरब का सूरज उग रहा हो। कंघे से बाल काढ़ कर चोटी बनाती, उसे रबरबैंड से बांधती थी, जैसे लगता था काले मेघों को किसी ने बस में कर लिया हो। फिर सिंदूर की लाली से अपनी मांग को सजाती थी। बस इतना ही करने से वो इतनी ख़ूबसूरत लगने लगतीं कि उनके चेहरे की दीप्ति का पूर्णमासी का चांद भी मुकाबला नही कर सकता था।

मन में वर्षों पूर्व जन्म ली हसरत ने साकार रूप ले लिया। आज मेरे पास मेरा अपना वैनिटी बॉक्स जिसके बग़ैर मैं कहीं यात्रा कर ही नही सकती। मेरे प्रोफेशन में यात्रा और मेकअप यही दोनों चीज़ें ख़ास हैं। अपने देश की जानी मानी मॉडल जो हूँ मैं। मेरे वैनिटी बॉक्स में क्या नही है फाउंडेशन, आई लाइनर, आई शैडो, मस्कारा, पाउडर, क्रीम, आयल, ब्लशर, लिपस्टिक , नेलपॉलिश..... वो भी एक नही कई कई शेड में।

सच बताऊँ तो जब मैं मेकअप उतारती हूँ, मुझसे अपना ही चेहरा नही पहचाना जाता। आंखों के नीचे गड्ढे, पैची स्किन, बदरंग होंठ मुझे आईने में से डराने लगते हैं। मौसी कैसे बिना मेकअप के भी इतनी सुंदर लगती थी?

बहुत दिनों बाद मौसी के बेटे की शादी में उनसे मिलना हुआ। क्रीम कलर की सिल्क की साड़ी में सादगी की मूर्ति बनी मौसी चली आ रही थीं। मेरे स्ट्रेट लहराते हेयर का दम्भ उनके जूड़े के आगे कहीं फ़ीका सा पड़ गया था। उनके चेहरे की चमक मेरे महंगे फाउंडेशन, ब्लशर को मुंह चिढ़ा रही थी।

मैंने उनके पैर छुये , उन्होंने मुझे गले से लगाया, और मुझसे मेरे हाल चाल पूछे। मेरे दिमाग में तो एक ही प्रश्न खौल रहा था। " मौसी, आप इतनी सादगी में भी इतनी सुंदर कैसे लगती है ?"

मौसी हँसते हुये बोली - "चल मक्खनबाज।"

"नही मौसी , मुझे जानना है। आप कुछ तो लगाती हैं, जो इतनी अच्छी स्किन है आपकी, इतना ग्लो है आपके चेहरे पर।"

" हम्म..तो सुनो। मेरी पढ़ाई लिखाई एक सरकारी स्कूल में हुई थी। जब मैं कक्षा आठ में आई तो मेरे ऊपर फैशन का भूत सवार हो गया। हीरोइनों की तरह नोकदार काजल लगाना, बिंदी लगाना, तरह तरह की हेयर स्टाइल बनाना और नेलपॉलिश लगाना।"

" मेरी क्लास टीचर एक ईसाई महिला थीं मिसेज़ डिसूज़ा। उन्होंने कई दिन तक मुझ पर नज़र रखी। मैं सुधरने वाली कब थी। फिर एक दिन उन्होंने मुझे क्लास में सबके सामने बुलाया और कहा- "ये सब क्या है? तुम्हें क्या लगता है इन सब से सुंदरता बढ़ती है? सुंदरता सादगी में होती है। भगवान ने जैसे जिसे बनाया है वो वैसे ही सुंदर लगता है। कभी देखा है चिड़ियों को अपने परों को नकली रंग रंगते हुये या हिरनियों को काजल लगाते हुये ? सुंदरता मन का ओज है, तन का नही। सुंदरता अपने अंदर का आत्म विश्वास है, उधार का विश्वास नही।"

मौसी जैसे अतीत में विचरते हुये आगे बोलीं-"उस दिन से मुझे उनकी बात समझ आ गयी। जो सुंदरता थोड़ी देर के लिये बाहरी मेकअप का इस्तेमाल करके मिले, वो आपकी अपनी सुंदरता नही। वो तो झूठा आवरण है। जिससे आप ख़ुद को और दूसरे को बेवकूफ़ बना रहे हैं। दूसरी बात मेकअप के ज़्यादा इस्तेमाल से आपकी नैसर्गिक सुंदरता की उम्र तेजी से घटने लगती है। इसलिये वो दिन और आज का दिन मैंने बिंदी और सिंदूर के अलावा कभी कुछ मेकअप नही किया। "

मौसी की बातों ने मुझे कहीं न कहीं बैचैन कर दिया। मेरी अस्त व्यस्त जिंदगी, भारी मेकअप और यात्रायें मुझे कहीं न कहीं कुरूप बनाते जा रहे हैं इस पर मैंने ध्यान ही नही दिया।

तत्काल मैंने निर्णय लिया बस बहुत हुआ। प्रोफेशन बदलना अब बस में नही। पर जब जरूरी हो तभी मेकअप करना तो मेरे बस में है। ये लाइम लाइट की चमक दमक के लिये हर समय बनावटी बने रहना, नकली सुंदरता ओढे रहना...ख़ुद को ही छलना है। मैं जैसी हूँ दुनिया को वैसी ही ज़्यादा से ज़्यादा नज़र आऊँ। कम से कम अपनी नज़र में तो मैं सुंदर रहूं।

मैंने तुरंत वाश रूम जाकर अपना मुंह धोया लहराते बालों को क्लच से काबू में किया। शीशे में अपने को भरपूर देखा, और ख़ुद को विश्वास दिलाया मैं बिन मेकअप के बहुत ज़्यादा सुंदर लगती हूँ। विश्वास मानिये, मेरे आत्मविश्वास ने वो चमक मेरे चेहरे पर ला दी थी, जो मंहगे से मंहगे फेशियल से भी आज तक नही मिली थी।




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