राजकुमार बड़जात्या ने आदिवासी की टोडा जनजाति के लिए करोड़ो का सेट तुड़वा दिया था


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एक कहानी आदिवासियों की


पिछले हफ़्ते राजकुमार बड़जात्या जी का निधन हो गया.... वहीं बिजोन दा ने एक कहानी सुनायी।


बात तब की है जब 'मेने प्यार किया' बन्ने वाली थी.... राजकुमार जी लोकेशन तलाशने अपने दल-बल के साथ निकले..... लक्ष्य था पहाड़ों के बीच सुंदर लैंडसकेप में भाग्यश्री का घर दिखाना.... उत्तराखंड की कई लोकेशंस पसंद आयीं, लेकिन प्रोडक्शन ने मना कर दिया कि समतल ज़मीन के अभाव में सेट नहीं लग सकता और डाँस वग़ैरह शूट नहीं किया जा सकता... दबाव बनाया गया कि ऊटी चलिए वही बेस्ट रहेगा..... और वही हुआ भी कि ऊटी में लोकेशन मिल गयी और सेट लग गया।

लेकिन सेट लगने के बाद मुंबई ख़बर आयी कि कोई आदिवासी कबीला सेट तोड़ने की बात कर रहा है..... लाखों करोड़ों लगे हुए थे,, लोग घबरा गए.... फ़ौरन स्टेट के गवर्नर से मिलने पहुँचे उन्होंने इस मामले में पड़ने से इंकार कर दिया... स्टेट सीएम ने भी मना कर दिया कि इस ट्राइब के मामले में हम दख़लअंदाजी नहीं कर सकते, एक जर्मन महिला हैं, आप उनसे बात कर लीजिए।

ये आदिवासी जनजाति थी टोडा ट्राइब जो नीलगिरी में पायी जाती है.... और ये जर्मन महिला भी कभी इसी मूल की थीं जो पिछले वंश में किसी तरह जर्मनी पहुँच गयी थीं और अब जर्मनी से भारत वापस आ चुकी थीं अपने पुरखों के क़बीले और संस्कृति की रक्षा करने के लिए.... इंदिरा गांधी का ज़माना था और जब ये बात उन्हें बतायी गयी तो इंदिरागांधी ने उसी समय उस पूरे क्षेत्र को टोडा क़बीले के लिए रिज़र्व करा दिया... आज भी ये इलाक़ा UNESCO के संरछित इलाक़ों में से एक है ...
  • परेशान बडजात्या टीम उस जर्मन महिला के पास फ़रियाद लेकर पहुँचे, लेकिन महिला ने मना कर दिया.... जब इन्होंने ज़्यादा रेकवेस्ट करी तो उस महिला ने जो कारण बताया वो इंटरेस्टिंग है। 
दरअसल तोड़ा जाति का मूल पेशा मवेशी पालना है... भैंस इनकी पूज्य होती हैं.... ये मवेशियों के उत्पाद बेचकर ही जीवन यापन करते हैं.... जब जर्मन महिला (नाम मैं भूल रहा हूँ) इनके बीच रहने आयीं तो अन्य सुविधाओं के साथ सबसे पहले उन्होंने इनके मवेशियों के लिए एक डॉक्टर की व्यवस्था करायी।

लेकिन एक नयी बात ये सामने आयी के अचानक मवेशी मरने लगे.... हर दूसरे तीसरे दिन कोई न कोई मवेशी मर जाय... डॉक्टर ये तो समझ गया कि ये कोई महामारी है लेकिन क्या? ये न समझ पाया।

फ़ाइनली एक मरे हुए मवेशी का उसने पोस्टमार्टम करने का फ़ैसला किया... और जब उसने देखा तो उसके लीवर और आँतों में गोल्डन रंग के काफ़ी सारे टुकड़े निकले.....जो कि हैरान करने वाला था।

आपको याद होगा कि लेट एट्टीज़ और नाइंटीज वो दौर था जब अधिकतर शूटिंग्स ऊटी और आस-पास के इलाक़ों में हुआ करती थी... इस शूटिंग के दौरान नक़ली धमाके दिखाने या डाँस सीकवेंस को रंगीन बनाने के लिए जो रंगीन पटाखों के धमाके किए जाते थे, उसके रेज़े उड़-उड़ कर घास में दूर दूर तक बिखर जाते थे. और घास में चिपके ये रंग बिरंगे केमिकल और पन्नियों के टुकड़े मवेशी चर लिया करते थे,, जिसकी वजह से इनकी मौतें हो रही थीं।

ख़ैर. बडजात्या साहब अच्छे आदमी थे, जैसे ही उन्होंने ये सुना, फ़ौरन आदेश दिया कि सेट ख़ुद तोड़ दो हम प्रकृति को नुक़सान पहुँचाकर फ़िल्म नहीं बनाएँगे।

अब सोचिए अगर यहाँ कोई व्यापारी दिमाग़ वाला होता तो क्या यही होता??? अगर वो महिला न आती और डॉक्टर न मिलता तो मवेशी और वो जाति दोनो ही भीड़ में गुम कर ख़त्म हो जाती या लेबर बनकर दिल्ली - मुंबई पहुँच चुकी होती, अगर इंदिरा गांधी ने इस क़बीले को सीरियासली लेने के बजाय अराजक मान लिया होता?????

दरअसल... यही "अगर" महत्वपूर्ण है....... बशर्ते आप एक ४-५०० लोगों के क़बीले को 'महत्वपूर्ण' माने तब... नहीं तो ये जंगल, ये ज़मीन, ये हवा, ये नदियाँ कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं.... सबका दोहन करिए और उन्हें काग़ज़ में बदलते नोटों में देख ख़ुश होते रहिए।





यह लेख तान्या त्रिपाठी की फ़ेसबूक वाल से ली गयी है जिसे लिखा है हैदर रिजवी ने । 






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