नहीं कर सकता है कोई वैज्ञानिक मेरी बराबरी मैं चाँद देखने सायकल से जाया करता था




पूँजीवाद के इस भागते दौड़ में जहाँ प्रेम बनावटी और कंडिशनल होता जा रहा है। जहाँ प्रेम हुडा सिटी जाने की जल्दी में क़ुतुब के साथ हो लेता है उसको अकेला छोड़ कर , जहाँ सब कुछ इतना तेज़ हो चुका है की अगर आप चूके ,तो सामने वाला कब आपका भिड़ा के आपकी ले लेगा ,आपको पता तक नहीं चलेगा और जहाँ  ब्रो कोड बस एक बीयर की बॉटल से ज़्यादा कुछ नहीं है। सारे आदर्श सारे एथिक्स सब जीबी रोड जैसी है , उजाले में कुछ और , और अंधेरे में कुछ और।

दिल्ली की उस भागती दौड़ती दुनिया में जब सोहन को लगा की उसको प्रेम हो चुका है लेकिन ख़ुद सहज नहीं हो पा रहा था इस भाव को लेकर , पहली बार था इसलिये तय नहीं कर पा रहा था। अपनी उत्कंठा लेकर वो अपने दिल्ली के उस दोस्त के पास जा पहुँचा जो लड़कियों को बंदी बोलता था।

दिल्ली में अगर आप कमिटेड है तो अपने उन दोस्तों से कुछ भी साझा न करे जो सूद/कुकरेजा/सेठ लगाते हो अपने नाम के पीछे। सूद/कुकरेजा/सेठ ने सोहन से बहुत मज़े लिये और सोहन के पूछने पर उसको ग़लत सलाहें दी है , उस दिन भी दी और सोहन मान भी गया।

सोहन अगले दिन उस लड़की से मिला और सलाह के मुताबिक़ उससे कल पार्क में आने के लिये पूछा , लड़की ने हाँ कर दी ,सोहन बहुत ख़ुश हुआ और सूद/कुकरेजा/सेठ से जाकर सारी बातें बता दी।

अगले दिन जब पार्क में सोहन अपनी प्रेमिका के साथ बैठा था तो कुछ मिनट के बाद ही अचानक से कुछ लोग आये और उसको पीटने लगे , उसको बहुत मारा और मार के भगा दिया।

प्रेमिका को सोहन ने गांधी जी पे पिस्तौल ताने देखा है फ़िलहाल और सूद/कुकरेजा/सेठ 14 फेब को फिर से दिखेंगे पार्कों में।

सोहन कि सबसे बड़ी ग़लती थी की उसने नेहरु से भी ज़्यादा उस लड़की से प्यार किया और लड़की को हमेशा से ये लगा की सोहन सबसे ज़्यादा नेहरु से प्यार करता है , संघी थी और सूद/कुकरेजा/सेठ की दोस्त भी , ले ली बदला ....

संघियो और सूद/कुकरेजा/सेठ से बच के रहे , सोहन नहीं बच सका , आप बच के रहिये , प्लीज़...







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