नेहरू को दोष देना बंद करें और खुद को कट्टर होने से बचाएं

By - डाकिया चमन


मसूद अज़हर को लेकर आज फिर नेहरू का भूत निकल आया। इन 5 सालों में हर तीसरे दिन नेहरू का भूत सरकार के सामने किसी ना किसी तरह आ ही गया है। ऐसे में ये डालना ज़रूरी हो जाता है।

नेहरू के पिता का नाम ग्यासुद्दीन गाजी था। जवाहर अपने आप में अरबी शब्द है, कोई कश्मीरी पंडित अपने बेटे का नाम जवाहर क्यों रखेगा ?

नेहरू मुगलिया खानदान की औलाद था। अय्याश तो इतना बड़ा था, कि विदेशी लड़कियों के साथ सिगरेट ही पीता रहता था। बताओ तो, प्रमाण के लिए प्रत्यक्ष फ़ोटो दिखाऊं! 

नेहरू की वजह से कश्मीर समस्या खड़ी हुई। चीन के साथ युद्ध नेहरू ने जानकर हरवा दिया। नेहरू अंग्रेजों का चमचा था। 

दरअसल, नेहरू को उसके चाटुकार बुद्धजीवियों ने महान बना दिया, नहीं तो बताओ जिन अंग्रेजों ने देश को गुलाम बनाया उन्हीं अंग्रेज की पत्नी ऐडविना के साथ चोंच लड़ाता था, कहो तो प्रमाण के लिए प्रत्यक्ष फोटो पेश करूं?

 केवल इतनी फ़ेक न्यूज़ नहीं हैं एक दो और भी होंगीं, जो इन पांच सालों में एक विशेष विचारधारा के पेड समर्थकों ने फैला पाई हैं। 

अब मैं बहुत सारा माल आपको दे रहा हूं, अपनी-अपनी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में सर्कुलेट कर दीजिएगा। सौ फीसदी नया है, मार्केट में पहली बार।

अगर नेहरू ना होते तो हम हिंदू राष्ट्र होते। हम पाकिस्तान होते। यहां मुसलमान नहीं होते। अगर होते तो जैसे पाकिस्तान में हिंदू हैं, वैसे होते। 

कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते तो भारत के संविधान की प्रस्तावना के विशेष फिचर- लोकतंत्र, समाजवाद, फंडामेंडल राइट्स, सेकुलरिज़्म नहीं होते। 

कितना अच्छा होता। अगर नेहरू नहीं होते, तो भारत एक भारत नहीं होता, ऐसे 20-30 भारत होते, जो हर तरह (धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय) की कट्टरता के अपने-अपने अलग-अलग पाकिस्तान होते।

कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते, आधुनिक सोच नहीं होती, आधुनिक शिक्षा नहीं होती, आधुनिक विचारों की तरफ हम नहीं मुड़ते, वैज्ञानिक सोच को हम तवज्जो नहीं देते

और हम प्रधान सेवक (मोदी जी) के शब्दों में सपेरा होते. बीन बजाते हुए सपेरा। जंगलों में नागिन के ढूंढ़ने के लिए जटा बढ़ाए हुए घुम रहे होते।

सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट! छि! क्या बना दिया नेहरू ने, सपेरा होते, सोचो कितना अच्छा होता। 

अगर नेहरू ना होते, तो दुनिया में क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवें और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े देश में बिजली नहीं होती! क्योंकि बांध ही नहीं होते, मंदिर होते- वाउ !

मंदिर ही मंदिर या फिर मस्जिद ही मस्जिद ही। हर नुक्कड़ पर एक मंदिर-एक मस्जिद, सोचो कितना अच्छा होता। 

अगर नेहरू ना होते, तो गांधी को कितनी जल्दी मार सकते थे, सरदार पटेल के विचारों कितनी जल्दी धूल में मिला सकते थे, देश को कट्टरता की तरफ मोड़ने में हमें 70 साल थोड़ी ना लगते, सोचिए कितना अच्छा होता।

अगर नेहरू ना होते, संविधान भी होता और सुप्रीम कोर्ट भी होता, लेकिन बिलकुल वैसा ही जैसा पाकिस्तान का सालों पहले तक रहा है। 

अगर नेहरू ना होते तो हम चीन से नहीं हारते, क्या जाता था युद्ध ही नहीं करते- हमें तो गुलामी की आदत पड़ी थी दे देते जमीन, बच्ची हुई जमीन में अपना हिंदू राष्ट्र चलाते/बनाते। 

सोचिए...सोचिए...कितना अच्छा होता। अगर नेहरू ना होते....

नेहरू आज भी नासूर हैं क्योंकि-

 भगत सिंह ने जेल में नेहरू और गांधी में से नेहरू को चुना था। गांधी ने पटेल और नेहरू में से नेहरू को चुना था। 

गांधी की शव यात्रा में नेहरू आंसूओं से रो रहे थे। बच्चे की तरह भागते फिर रहे थे।

 पटेल के साथ वैचारिक मतभेद होने के बाद भी राज्यों को एक करने के वक्त पटेल के पीछे दीवार की तरह खड़े रहे थे।

हजार विरोध होने के बावजदू, अपने मंत्री (अंबेडकर) के इस्तीफा देने के बाद भी हिंदू मैरिज एक्ट समेत कई बिल पारित कराकर हिंदू धर्म में सुधार का जिम्मा उठाया था।

 जेल में बैठकर किताबें लिखने वाले नेहरू को इस देश की जनता ने सर आंखों पर बिठाया। लोगों ने नेहरू को पत्थर मारे, नेहरू ने उन्हें पुचकारा। 

नेहरू कोई सड़क पर घूमता हुआ दो कौड़ी का ‘ब्लडी इंडियन’ नहीं था, चाहता तो जिंदगी भर विदेशों में मौज से रहता और उसकी सात पीढ़ियां अमेरिका में रहिशी से जीती

लेकिन, एक करीब-करीब उज़ड़े देश को उसने बनाया, और देश ने इसे समझा, हाथों-हाथ लिया। नेहरू ने इस देश को हमेशा खुद से और खुद की पार्टी से ऊपर रखा।

मैं तो कहता हूं, नेहरू के कितने किस्से सुनने हैं, मुझे बताओ।

वो सुनाऊं जब आनंद भवन में स्कूल के लड़कों ने बरसात में किताबें भीगने की बात कही तो कैनवास के बस्ते और बरसाती कोट दिल्ली से नेहरू ने भिजवाए थे।

या फिर वो जब पिता मोतीलाल के मना करने पर भी छिपकर 101 रूपए बुंदेलखंड राहत कोष के लिए चंदा मांगने आए लड़कों को दिये थे।

या फिर वो जब पार्टीशन के वक्त आदमपुर के पास कमालपुर में मुस्लिम शरणार्थियों के कैंप में नेहरू गए तो ‘हत्यारा आ गया…जल्लाद आ गया…जालिम आ गया’ के नारे मुसलमान लगा रहे थे, जब कैंप से वापस लौटे तो- ‘गांधी नेहरू हमारे माई-बाप हैं…वजीरे आज़म हिंदुस्तान, जिंदाबाद’ के नारे लग रहे थे।

या फिर वो जब इलाहाबाद वापस लौट रहे थे तो सर्दियों में अंधेरे के दिनों में उनकी कार से एक गाय टकरा गई, उसका सींग टूट गया तो नेहरू सड़क पर खड़े रहे पता किया ये किसकी गाय है, फिर उस व्यक्ति को इलाज के लिए पैसे दिए।

या फिर वो जब उन्होंने खुद ही मॉडर्न रिव्यू में आर्टिकल लिख कर देश को आगाह किया कि नेताओं के फैन मत बनिए, नहीं तो वो तानाशाह बन सकते हैं। आप लोग जितना प्यार मुझे करते हैं, ऐसे वक्त में मैं भी तानाशाह बन सकता हूं। 

छोड़िए, इस देश के हर शहर में, हर कस्बे में नेहरू को लेकर हजार कहानियां हैं। 

आप सुनेंगे तो कहेंगे कि ऐसा नेता भी हो सकता है क्या ? इसका मतलब ये कतई नहीं है कि मैं नेहरू को सौ फिसदी सही या परफेक्ट मानता हूं, नहीं मानता लेकिन हां, भारत का अब तक का सबसे बड़ा लीडर जरूर मानता हूं। 

जो कहता था कि ‘मुझे मीडिया का ज्यादा हस्तक्षेप भी पसंद है, मीडिया के जड़ होने की बजाय।’ या फिर ‘अख़बार सरकार की आलोचना नहीं करेंगे तो कौन करेगा।’ 

 खैर, नेहरू को लेकर मैं बिलकुल भावुक नहीं हूं। आपसे एक ही गुजारिश है, धर्म और राजनीति का मिश्रण किसी भी देश के लिए खतरनाक है। खुद को कट्टर होने से बचाइए।

 आधुनिकता, उदारता और धर्मनिरपेक्षता के साथ रहिए चाहे अकेला ही क्यों ना रहना पड़े। यही राष्ट्रवाद है, यही देशभक्ति है।







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