JNU के दो बार के छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर 'चंदू' की नृशंश हत्या की बरसी पर उन्हें क्रांतिकारी कोटिश नमन

By - डाकिया मृत्युंजय 

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JNU के दो बार के छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर 'चंदू' की नृशंश हत्या की बरसी पर उन्हें क्रांतिकारी कोटिश नमन

31 मार्च 1997, शाम 4 बजे सिवान के जे.पी. चौक (बिहार) पर शहाबुद्दीन ने चंदू के साथ उनके साथी श्यामनारायण और भुटेले मियां की गोली मारकर हत्या करवा दी थी।

चंदू के एक वक्तव्य का अंश :

"हम अगर कहीं जायेंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाजों की शक्ति होगी, जिसको डिफेंड करने की बात हम सड़कों पर करते हैं। और अगर व्यक्तिगत महत्वकांक्षा होगी तो भगत सिंह के जैसे शहीद होने की महत्वकांक्षा होगी, न कि JNU के इलेक्शन में गाँठ जोड़ जीतने या हारने की महत्वकांक्षा होगी।"

चंद्रशेखर एक ज्यादा बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया। चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं। 1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया।

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समय की कमी का बहाना बनाया गया। चंद्रेशेखर ने वहीं आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लाॅक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जबरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया। यह एक खतरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का खतरा उठाकर भी अंजाम दिया।

चंदू ने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया। जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी। चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी।

चंदू के बारे में एक मशहूर घटना है। 1993 में छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्रों से संवाद में किसी ने उनसे पूछा, ‘क्या आप किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं?’ इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत।’ और उन्होंने वही किया भी आख़िर, जो उनसे पहले बाबू जगदेव प्रसाद ने किया था 5 सितंबर 1974 को। बेख़ौफ़ होकर काम किया।




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