नैतीक शिक्षा के लिए काम कर रही है लखनऊ की ये लड़की


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जहाँ एक तरफ चुनाव नजदीक हैं शिक्षा को लेकर सरकार का ताना बाना शुरू हो चुका है. लेकिन इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं. जिनके के लिए शिक्षा का महत्व कुछ और है. जी हाँ आज हम यहाँ बात कर रहे हैं लखनऊ में रहने वाली ऋचा मिश्रा के बारे में जिनका लक्ष्य हर बच्चे को नैतिक शिक्षा प्रदान करना और उसे लक्ष्य की ओर बढ़ावा देना है. ऋचा लखनऊ से हैं और वहीं रहकर नैतिक शिक्षा से वंचित बच्चों को पढ़ाई करने और स्कूल जाने के लिए प्रेरित करती हैं. ऋचा का सपना है कि एक दिन उनका खुद का एक प्रीस्कूल हो जिसमें 1000 से ज्यादा बच्चे एक साथ पढ़ सके. ऋचा लखनऊ में इस वक्त एक बस्ती के बाहर रेलवे पटरी के पास बच्चों को पढ़ाती हैं. हाल ही में ऋचा से हुई हमारी खास बात चीत में उन्होंने हमें अपने सपनों के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि कैसे लोगों ने उन्हें इन बच्चों के पास आने से रोका,  कुछ ने कहा कि गरीब बच्चों को पढ़ाने से ऊनका स्तर गिर जाएगा लेकिन ऋचा ने किसी की एक न सुनी और आज उनके छात्र उनका नाम रोशन कर रहे हैं.


एक टीचर बनने का ख्वाब कब आया और फिर क्यों अपने इसे अपना प्रोफेशन बनाया.

टीचिंग को अपना करियर बनाना मेरी जिंदगी सबसे बड़ा और अहम् फैसला रहा है. मेरे इस फैसले को में सबसे खास मानती हूं. मैं समझती हूं की ये मेरे व्यक्तिव को भी सूट करता है (मुस्कुराते हुए ), या कहे तो इस कम से मुझे एक संतुष्टि मिलती है नन्हें बच्चों को पढ़ाना एक अलग चैलेंज है, ये आसान नहीं है. मैंने अपने टीचिंग का सफर एक ट्यूशन टीचर की तरह शुरू किया था. लेकिन आज मैं स्कूल, NGO,  ट्यूशन हर जगह काम कर रही हूं. शुरूआती दिनों में मेरे पास महज एक बच्चा पढ़ने आया करता था. लेकिन आज समय ने मेरा साथ दिया है और मेरी मेहनत रंग लायी है. आज की तारीख में कुल 100 से ज्यादा बच्चों को पढ़ा रही हूँ. 

आपके लिए वो कौनसी दिक्कते थीं जो इस प्रोफेशन को चुनने में बाधा बनी ?   

दिक्कतें तो ज्यादा नहीं आई, लेकिन लोगों ने मुझे यहां इन बच्चों के करीब आने से बहुत रोका. लोगों ने मुझपर उंगली उठाते हुए कई बार कड़वे स्वर में ये जरुर कहा है कि '' उन लोगों के बीच क्यों जाती हो, वो गंदे हैं .. उन्हें रहने खाने का पता नहीं.. तुम्हे वहां मेहनत करके क्या मिलेगा कम से कम अपना स्तर तो बनाए रखो.. '' लेकिन वो कहते हैं न हर रात के बाद एक सवेरा होता है.. कुछ वैसा ही मेरे साथ भी हुआ.. धीरे धीरे मेरे छात्रों में बदलाव दिखाई देने लगा .. जिनकी जबान से पहले गलियां निकला करती थीं वो अब ' गुड मोर्निंग और गुड आफ्टरनून ' बोलना सीख गए हैं. जहां लोग शुरुआत में मुझे मेरा स्तर समझा रहे थे वहीं मेरे छात्रों ने उन्हें उनका स्तर दिखा दिया. मैंने अपने NGO में कई लोगों को बुलाया जिन्होंने बच्चों को बाहर की दुनिया से अवगत कराया. सबके ताने अब मीठे तराने में बदल चुके थे. मेरे लिए वो बहुत बड़ी लड़ाई थी जो में अब पार कर चुकी हूँ. 


अपनी प्रेरणा के बारे में कुछ बताइए, कहा से मिलती है और कैसे मिलती है ?
मेरी प्रेरणा मेरे छात्र हैं. उनके चेहरे पर जो ख़ुशी होती है जब मेरी क्लास चलती है, वही मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है .. जिससे मुझे बहुत ताकत मिलती है. येही है जो मुझे रोज इन बच्चों के साथ कुछ नया करने की प्रेरणा देता रहता है. 

क्या कभी ऐसा हुआ कि ये सब को छोड़ने का मन किया हो ?

शिक्षण केवल मेरा पेशा नहीं है, बल्कि यह मेरा जुनून भी है. येही कारण रहा है कि मैंने कभी इसे छोड़ने की नहीं सोची न मेरे मन ये ख्याल कभी आया. बल्कि मेरा सपना है कि मैं एक ऐसा प्री स्कूल शुरू करूं जहां 1000 से भी ज्यादा शिक्षा से वंचित बच्चे एक साथ पढ़ सके. जहां मैं उन्हें पढ़ा सकूं ये सपना जरुर पूरा होगा. 

इन बच्चों में आपको ऐसा क्या दिखा जो आपको इनके बीच ले आया ?
जैसा कि मैंने पहले भी बताया कि, इन बच्चों को पढ़ाने का एक अपना ही मजा है जो अलग है. इन बच्चों में गजब का टैलेंट है कोई कमाल का गायकी का हुनर रखता है. तो वहीं किसी का डांस आपको गोविंदा की याद दिला देगा. कुछ बच्चों कि ड्राइंग इतनी अच्छी है कि कभी-कभी में भी हैरान हो जाती हूं. इतनी क्षमता होने के बाद भी ये बच्चे पीछे रह जाते हैं. दुख सिर्फ इस बात का है. यही वजह है कि मैं खुद इन बच्चों को अपना समय देती हूं.. इनसे बात करके इन्हें आगे ले जाने का सोचती हूं. ये बच्चे भी बहुत मेहनत करते हैं.

इन बच्चों कि जिंदगी में क्या बदलाव देखना चाहती हैं ? 

बदलाव मैंने देखा है, शायद हर दिन देखती हूं.. जी मैं सच कह रही हूं.. जब मैं यहां आई थी तो बच्चों को यहां अपना नाम नहीं लिखना आता था. Abcd से  इनका कोई नाता नहीं था. लेकिन पढ़ने का जुनून जरूर था. फिर क्या था हर शाम क्लास हुई बच्चों ने मेहनत की और रोज कोई न कोई अपना नाम लिखता  और पोएम सुनाता गया.. इससे बड़ा बदलाव मेरे लिए क्या होगा. मैं बस इतना चाहती थी कि ये बच्चे खुद को कम न समझे इनमें भी वो बात है जो सारे दूसरे बच्चों में होती है. में इनके लिए बस यही चाहती हूं कि ये कहीं भी जाए अपने टैलेंट से धूम मचा दे. जो ये आज कल बड़े मन से कर रहे हैं. 

आज के समाज से आप इन बच्चों के लिए क्या मदद चाहती हैं ? 

आज के समाज में हर कोई अपनी ज़िंदगी खूबसूरती से जी रहा है. सबके पास जीने के सारे संसाधन मौजूद हैं. मिडल क्लास परिवार भी आराम से अपना जीवन यापन कर रहा है. लेकिन में चाहती हूं कि लोग अगर पैसे से मदद ना कर पाए तो अपना समय देकर इन बच्चों की मदद करें. इन्हें समझाए इनसे मिले इनकी दुनिया और अपनी दुनिया के बीच की वो लाइन मिटा दे जो इन्हें हमारे साथ खड़े होने से रोकती है. हर कोई अपनी ओर से मदद करे और देखिए कैसा बदलाव होता है. 


बच्चों से हटकर आपके जीवन का सपना क्या है ?

मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना है कि मैं अपना खुद का प्रिस्कूल खोलू और उसे  बहुत ढंग से चलाऊं. मैं चाहती हूं कि उसे में अकेले मैं चलाऊं क्योंकि मैंने कई स्कूल्स को टूटते हुए देखा है. इस वजह से में यह सब अकेले करना चाहती हूं.. मेरे इस सपने मेरे साथ कई लोग होंगे जिनमें सबसे उपर मेरे एंनजीओ अभिकल्पना एक पहल के धीरज सर मेरे साथ होंगे. शायद अब तक मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना यही है. आगे देखते हैं क्या होता है..

आज जहां आप पढ़ाती हैं उस जगह को आप कैसे बदलना चाहती हैं. इस वक़्त आप बच्चों को पटरी के पास पढ़ाती हैं. तो अभिकल्पना को कहां ले जाना चाहती हैं. 

बात पटरी की नहीं है, बात यहाँ विद्या की है. मैं इन बच्चों को इसलिए पढ़ाना चाहती हूं क्योंकि ये अपने कल के लिए तैयार हो पाए. इतना ही नहीं जब ये कल किसी की ऐसी मदद करें तो उसे भी आगे का रास्ता दिखा पाए. अभिकल्पना अब मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन चुका है. इसे में बहुत आगे ले जाना चाहती हूं जहां हर कोई इसका और मेरे बच्चों का नाम जाने. बाकी मैं तो हर दिन मेहनत कर ही रही हूं.. शुक्रिया







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