स्तरहीन मीडिया डिबेट्स जिम्मेदार कौन ?

By - डाकिया गणेश


"आप माफी मांगिए आप माफ़ी मांगिए और उधर से शीशे के ग्लास के फूटने की आवाज के साथ टीवी न्युज24 के एंकर संदीप चौधरी के कपड़े पानी पानी"

घटना दिनांक- 6.4.2019 प्राइम टाइम डीबेट न्युज 24

दरअसल विगत पांच साल से मीडिया डीबेट स्तर बहस के नाम स्तर बड़े बेहद निचले स्तर तक पहुँचा गयें है, जिसमे कुछ कथित एंकर सहित कुछ सत्ता पक्ष और विपक्ष के प्रवक्ता शामिल रहे टीबी चैनलों के टीआरपी और एंकरों को अपने नेम, फेम मे यह खुला wwF का दंगल हो गया, सबकुछ एकदम सटीक।

सोचिए कोई दस पंद्रह साल पहले जब न्यूज चैनलों के प्राइम-टाइम स्लॉट मे बाबा,भुतिया बंग्ले  और अंतरिक्ष ‘एलियन’ के शिकंजे से छुड़ाकर स्वस्थ स्टूडियो चर्चा की ओर लाया गया तो उद्देश्य था जनसंवाद के केंद्र में लोकोपयोगी मुद्दों को लाना। इससे अपेक्षा की गई थी कि एंकर उस मुद्दे पर यथासंभव जानकारी अपनी रिसर्च यूनिट से हासिल कर पूरी तरह सत्य के निकट पहुंचने की कोशिश करेगा। यानी वे पक्ष-विपक्ष दोनों पहलू से समाज को अवगत कराने की ईमानदार कोशिश करेंगे। इस राजनीतिक संवाद में विभिन्न पार्टियों के प्रमुख लोग होंगे और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक या अन्य मामलों में उस विषय के प्रतिनिधि तथा जानकार और स्वतंत्र विश्लेषक होंगे, जिनकी जानकारी और निरपेक्ष तर्कशक्ति विषय को ट्रैक पर रखेगी।

लेकिन एकाएक इन पांच सालो मे मीडिया डीबेट स्तर को ग्रहण सा लग गया  और तमाम दर्शकों की अक्सर ये शिकायत आने लगी कि टीवी चैनलों पर रोजाना बहस के नाम पर पता नहीं क्या होता है,और इन बहसों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जिसे ये बताता है कि देश में सार्वजनिक संवाद की हालत कैसी हो गई है। उधर कई बार जनता ये सोचती है कि क्या ऐसी  मीडिया डीबेट से पार्टियों का एक मिला जुला दंगल का अखाड़ा होता जा रहा।

आज सत्ता पक्ष बीजेपी हो या काँग्रेस हो या अन्य क्षेत्रीय दल हो सभी अपने-अपने प्रवक्ताओं को लगाम लगाने मे असफल रहे हैं नतीजा स्टुडियो का माहौल बेहद निचले स्तर को छु गया।

 "मीडिया डीबेट की आवश्यकता"

दरअसल यह प्रयास दो कारणों से किया गया। पहला, बेहद घटिया घटनाओं से संबंधित  विषय-वस्तु देने से समाज में मीडिया और खासकर संपादकों और मालिकों की छवि काफी गिरने लगी थी। दूसरा, प्रजातंत्र के बेहतर संचरण के चार मूल तत्व होते हैं-बहुमत का शासन, अल्पसंख्यकों के अधिकार की रक्षा, संवैधानिक शासन पद्धति और विमर्श से शासन। क्योंकि चुनाव जीत कर सरकार चलाना कोई चने बेचने का ठेका लेना नहीं है और सरकार से उसके कार्यों का हिसाब लगातार लेना, जनविमर्श के जरिये उसे अमुक कार्य करने या न करने के लिए प्रेरित करना और अगले चुनाव में उसे खारिज करने या फिर बहाल करने का भय बनाए रखना इसी विमर्श का हिस्सा होता है।

इसी अवधारणा के कारण मीडिया की भूमिका स्वस्थ प्रजातंत्र में अपरिहार्य मानी जाती है।

स्टूडियो परिचर्चा के जरिये यह सोच विकसित करने का प्रयास था कि सार्थक मुद्दों पर बहस के माध्यम से दर्शकों को दोनों पक्ष के तथ्य दे दिए जाएं और फिर उन्हें जनविमर्श के केंद्र में ला कर छोड़ दिया जाए ताकि अगले दिन सुबह नाश्ते की दुकान पान की दुकानों, सरकारी कार्यालयों और अन्य विमर्श के ‘कोनों’ में लोग इस पर चर्चा करें और प्रजातंत्र की जड़ें अतार्किक, अवैज्ञानिक तथा भावनात्मक मुद्दों की बाढ़ में बह न जाएं। साथ ही चूंकि भारत सरीखे परंपरागत देश में वैज्ञानिक सोच लाने के लिए कोई क्रांति हुई ही नहीं और वही उसी उद्देश्य को आगें बढ़ान मकसद था।

"डीबेटस का व्यापक असर"

जिन डीबेटस को कथित दिग्गज राष्ट्रभक्त स्वघोषित एंकर  कराने पे तुले हैं उसका समाज और देश पे बडा नकारात्मक असर हुआ है, आप अपने परिवार के साथ कुछ चैनलों के प्राइम टाइम डिबेट्स देख नही सकते वज़ह उनके भाषा शैली और स्टुडियो मे उग्र हो हाथा-पाई कर लेना आप देखेंगे तो  कभी मंदिर-मस्जिद मे उग्र डीबेट के जरिए एक समुदाय विशेष को लताडना हो या फिर भारत-पाक के नाम पे स्टुडियो मे ही सेना की वर्दी धारण कर देशप्रेम दिखाना हो,या फिर उकसाने वाले "बिषय" पे डिबेट्स को बढ़ावा देना हो अगर इन कथित एंकरों ने ऐसे विषय वस्तु को बढावा न दिया होता तो पार्टी प्रवक्ता इतने बेलगाम नही होते आप देखिए किसी दुसरे पक्ष को स्टुडियो मे उसके धर्म के नाम पे उकसाना फिर उसी स्टुडियो मे जलील करना यह बेहद शर्मनाक घटनाये इन सालो मे घटी है।

एक कथित निजि चैनल मे तो डीबेटस के दौरान लाइव शो मे ही एंकर उठ के विपक्ष से आये प्रवक्ता के साथ धक्का मुक्की करने के बाद जलील कर बाहर कर देता है तो सवाल यह कि फिर इस तरह की विषय वस्तु चुनी ही क्युं? और चुनी तो अब झेलो क्युं बाहर का रास्ता पकड़ लिए? कथित चैनलों,एंकरो,पार्टी प्रवक्ताओ सहित क्या दर्शकों के इस मांग को पुरा कर रहे हैं क्या टीवी चैनल इस विषय पे बिचार मंथन करेंगे क्या आखिर इन ऐन केन प्रकरणों से नुकसान किसका हुआ आपके एंकरी/टीआरपी का या फिर पत्रकारिता और पत्रकारिता के मापदंड का?

सोचिए आखिर क्या जरूरत आ पड़ी इतने उग्र डीबेट के एकाएक? क्युं एकाएक माहौल स्टुडियो का गरम हो गया ? टीआरपी प्रतिस्पर्धा या फिर अपने इमेज़ को राष्ट्रभक्त बनाने के चक्कर मे एंकरों मे आगे जाने की होड़ किसके शह पे होने लगी ? तमाम सवाल जो माथा पकड़ने पे मजबूर कर देगी।

आज देश में करीब 400 न्यूज चैनल है। जिनके लिए खबर महंगी, बहस सस्ती हो गई है। इन बहसों में तर्क की जगह हल्ला ही दिखता है। चैनलों पर सार्थक बहस के बजाए शोर-शराबा ज्यादा होता है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की कोशिश होती है।

आज भारत का मीडिया अपनी डिबेट्स के लिए पूरी दुनिया में बदनाम है. अब तक एंकर्स के आचरण पर ही सवाल उठाए जाते थे. कहा जाता था कि एंकर्स चिल्लाते हैं और मर्यादाओं का ध्यान नहीं रखते. लेकिन अब प्रवक्ताओं ने चीखने-चिल्लाने वाले कुछ एंकर्स को भी पीछे छोड़ दिया है. इसलिए अब राजनीतिक पार्टियों को भी ये सोचना होगा कि वो किन प्रवक्ताओं को न्यूज़ चैनल्स पर डिबेट में हिस्सा लेने के लिए भेजती हैं.

कुछ  पार्टियों के प्रवक्ताओं ने जो इन सालो मे न्यूज़ के स्टूडियो में किया.. वो दुखद है. ये घटनाएं भारत की राजनीति के गिरते स्तर का प्रतीक हैं. ये हमारे देश में राजनेताओं की एक नई पीढ़ी है. जिसमें धैर्य नहीं है. इन नेताओं को चाहिए. कि वो इंटरनेट पर मौजूद अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के भाषण सुनें और उनसे सबक लें. एक दौर ऐसा था अटल जी सहित तमाम नेताओं की बात सुनने के लिए, पूरी संसद चुप हो जाती थी.




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