नुसरत जहां के सिंदूर लगाने से मुस्लिम गौरक्षकों का जन्म हो गया



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फ़ोटो साभार - द इंडियन एक्सप्रेस

नुसरत जहां (Nusrat Jahan tmc) ने सिंदूर लगा लिया तो सनकियों ने उन्हें ट्रोल किया कि मुस्लिम होकर सिंदूर क्यों लगाया. शादी करके नुसरत जहां सजधज कर संसद पहुंचीं तो बहुत से मुस्लिमों ने सोशल मीडिया पर उन्हें गाली बकी.

कोई बूढ़ा मौलाना ऐसा करे तो हम समझें कि वह पुराने ख्यालात का है. लेकिन युवा ऐसा कर रहे हैं तो समझा जा सकता है कि ये मुस्लिम समाज के गोरक्षक हैं. इनसे भी सावधान रहने की जरूरत है.

धार्मिक कट्टरता में पगे मूर्ख एक जैसे होते हैं जैसे वे संघ ज्वाइन करें, चाहे मुस्लिम लीग या ओवैसी के समर्थक हों. इन बेवकूफों को भी हिंदुस्तान और इसके इतिहास के बारे में कुछ नहीं पता है.

इन्हें नहीं पता है कि अकबर के महल में होली और कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती थी. यह किसी मजबूरी में नहीं होता था, क्योंकि अकबर, मुख्तार अब्बास नकवी या शाहनवाज हुसैन तो था नहीं, वह हिंदुस्तान का बादशाह था जिसे अकबर महान कहा जाता है. उसने दीने-इलाही की स्थापना की थी और कट्टर मौलानाओं को औकात बता दी थी. वह जोधाबाई के साथ खुद होली में शरीक होता था. हिंदू और मुस्लिम दोनों ही होली जैसे त्योहार मनाते थे. शाहजहां, जहांगीर और बहादुर शाह जफर तक के होली मनाने का जिक्र मिलता है.
आज हिंदू मुसलमान के नाम पर जितनी उत्तेजना फैलाई जा रही है, इतनी तो मध्यकाल में भी नहीं थी. कहा जाता है कि महाराणा प्रताप अकबर से हारे थे, लेकिन वे हीरो हैं और अकबर को भी महान कहा जाता है. महाराणा प्रताप के सबसे बड़े सिपहसालार हाक़िम ख़ान थे. अकबर के सबसे बड़े सिपहसालार राजा मान सिंह थे. महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा साथी मुसलमान और अकबर का सबसे बड़ा साथी हिंदू.
हिंदी के तमाम भक्त कवियों ने उस समय इतिहास रचा जब देश में मुगलों का शासन था. अगर मुगल हिंदुओं के प्रति क्रूर होते तो यह संभव नहीं था.

अब आइए शिवाजी पर. इतिहासकार और लेखक राम पुनियानी के एक लेख का अंश देखिए-

''धारणा फैलाई जाती है कि शिवाजी मुस्लिम विरोधी थे. लेकिन शिवाजी के दादा मालोजीराव भोसले ने सूफी संत शाह शरीफ के सम्मान में अपने बेटों को नाम शाहजी और शरीफजी रखा था. शिवाजी ने स्थानीय हिंदू राजाओं के साथ ही औरंगजेब के ख़िलाफ़ भी लड़ाइयां लड़ीं. उस समय औरंगजेब की सेना का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति राजा जयसिंह थे. उधर, शिवाजी की सेना में एक तिहाई मुस्लिम सैनिक थे. उनकी नौसेना की कमान सिद्दी संबल के हाथों में थी. जब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब कैद से निकल भागने में एक मुसलमान मदारी मेहतर ने उनकी मदद की. उनके गुप्‍तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली थे और उनके तोपखाने की कमान इब्राहिम ख़ान के हाथों में थी. शिवाजी ने अपने कमांडरों को ये स्पष्‍ट निर्देश दे रखा था कि किसी भी सैन्य अभियान के दौरान मुसलमान महिलाओं और बच्‍चों के साथ कोई दुर्व्‍यवहार न किया जाए. मस्जिदों और दरगाहों को समुचित सुरक्षा दी गई थी. एक बार शिवाजी के सैनिक लूटे हुए सामान के साथ बसाई के नवाब की बहू को साथ ले आए तो शिवाजी ने उस महिला से पहले तो माफ़ी मांगी और फिर अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसे उनके महल तक वापस पहुंचवाया. आदिलशाही सल्तनत का प्रतिनिधित्व कर रहे अफ़ज़ल ख़ान के साथ शिवाजी ने बहुत लंबी लड़ाई लड़ी थी. अफ़ज़ल ख़ान ने उन्हें अपने तंबू में बुलाकर मारने की योजना बनाई थी तो शिवाजी को एक मुसलमान, रुस्तमे जमां, ने आगाह करके बचाया. 

उधर, अफ़ज़ल ख़ान के सलाहकार भी एक हिंदू, कृष्णमूर्ति भास्कर कुलकर्णी, थे जिन्होंने शिवाजी के ख़िलाफ़ अपनी तलवार उठाई थी.''

अब आइए हमारे दौर में. मैं एक धार्मिक हिंदू परिवार में पैदा हुआ. हमारे परिवार के लोग हर महीने तेरस पर अयोध्या जाते थे. बाबा रोज़ रामायण का पाठ करते थे और बिना नहाए, बिना पूजा किए पानी नहीं पीते थे. लेकिन हम सब छोटे थे तो मोहर्रम में रात को हमें जगाया जाता था. हम ताजिया देखने जाते थे. वहां फातिहा पढ़े जाने के बाद सिन्नी, मलीदा और खुरमा बंटता था. हिंदू लोग वहां दुआ मांगने आते थे. होली पर बहुत सारे मुस्लिम शामिल होते थे, रंग खेलते थे. यह सब आज भी होता है. लोग गांव भर में घूम कर होली गाते हैं, तो सुबराती चचा ढोल बजाते हैं. वे भजन कीर्तन में भी ढोल बजाते हैं. हमारी नाउन चाची दिशाशूल और मुहूर्त देखकर अपनी बेटी बिदा करती हैं.

जिस अयोध्या के नाम पर देश भर में दंगा कराया गया, उस अयोध्या में राम मंदिर में हिन्दू पुजारी पूजा करता है, 
मुसलमान राम के मुकुट की कलगी बनाते हैं. वे अयोध्या में चूड़ी, सिंदूर, प्रसाद वगैरह बेचते हैं. सीताराम की चूनर में गोटा और लैस लगाते हैं. अयोध्यावासियों को कभी इससे दिक्कत नहीं हुई.

तो हमने इतनी राम कहानी यह समझाने के लिए सुनाई कि भैया ई है भारत. अतुल्य और अद्भुत भारत. यह भारत न मनुस्मृति में है, न तुलसी की रामायण में है, न कृष्ण की गीता में है, न आसमान से नाजिल हुई कुरान में है. यह ऐसे ही आपस में घालमेल करके चलता है. इसे धर्मों की किताब से और अपने कट्टरता के डंडे से चलाओगे तो जाहिल कहलाओगे. यह अपने तरीके से चलता है.

अगर एक नाम की मुस्लिम, जो कि एक्टर है, दीगर धर्म के लड़के से अपने मर्जी की शादी करने, अपनी मर्जी का सिंगार करने के लिए गाली खाएगी तो हिंदू लड़की के यही करने पर कौन मुंह से बोलोगे? और तुम कौन होते हो यह तय करने वाले कि नुसरत किससे शादी करे और क्या पहने? ऐसी तमाम पढ़ी लिखी महिलाएं हैं जो अपने तरीके से जिंदगी जिएंगी. वे तुम्हारे बंद दिमाग से संचालित नहीं होंगी. 

यह समाज विविधताओं से भरा है. यह दाढ़ी, टोपी, चंदन और चुरकी से नहीं चलेगा. इसका अपना तानाबाना है. जो इसे छिन्न भिन्न करे, वही असली  देशद्रोही है.




नोट - यह लेख पत्रकार कृष्ण कांत के फेसबुक पन्ने से लिया गया है।


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