मजबूत लोकतंत्र जागरूक प्रजा के कंधों पर ही टिकता है और हम आदतन गुलाम है

By - हिंदी डाकिया


फ़ोटो साभार - FFE.ORG

ये इस देश के युवा है जिसे संसद की परिभाषा नहीं पता है, ले देकर केवल नेहरू की ग़लतियाँ पता है, एक दिन हमारी Ignorant पीढी नेहरू को गाली देते देते ही निबट लेगी राजनीतिक रूप से -एक ज्ञान पता है नेहरू की गलती ,हिम्मत नही है कि वर्तमान में जो हो रहा है उस पर मुँह खोल सके बोल सके बहस कर सके सवाल उठा सके। अद्भुत ग़ुलाम है सब। मुझे बताईये क्या आफ़त थी जो आनन फ़ानन में आरटीआई क़ानून को बदल दिया गया ? ससंद में बहस तक नही हुई -ससंद का नियम है कि विषय दो दिन एडवांस मे दिया जाता है सांसदों को ताकि वे समझ सके, विचारो के द्वंद को ही संसद कहते है न कि जहाँ केवल मेजॉरिटी का खेल हो।

अरे पुतले खड़े कर दे चुनाव में बेहतर होता - जहाँ Presdential Democarcy है वहाँ भी बहस होती है और हम कहते है की हमारी Parliamentary Democracy है ? ये कैसा लोकतंत्र है ? ये क्या पागलपन है ? ये कौन सी व्यवस्था है जो हमने चुनी है ? आज पता चला है कि संसद में कुर्सी मेजे फेंकी जाये वह गलत नहीं है बल्कि संसद में सन्नाटा हो जाये वह गलत है। दरअसल नेहरू की ही गलती है कि वे लोकतंत्र मज़बूत बनाने के चक्कर में ये भूल गये कि मज़बूत लोकतंत्र जागरूक प्रजा के कंधों पर ही टिकता है और हम आदतन ग़ुलाम है।

जरूरत व्यवस्था परिवर्तन की नही हृदय परिवर्तन की है हमे ,जरूरत जागरूकता की है ,झुक जाने की और आँख बंद करके सब मान लेने की सोच से बाहर आने की है।



- मंजरी पाठक की वॉल से।






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