अलविदा सुषमा स्वराज!



आज भी राजनीति में महिलाओं की राह आसान नहीं है। शुरुआती मौके जिन्हें अपेक्षाकृत आसानी से मिल जाएँ, उनके लिए भी नहीं।

इसलिए विनोबा ने महिलाओं से कहा था कि आज की राजनीति में पुरुषों की तरह मत पड़ो। पुरुष हिंसक हो जाता है। उसकी करुणा समाप्त हो जाती है। तुम्हारी भी हो जाएगी।

तुम अपनी तरह की राजनीति बनाओ। जिसमें अहिंसा हो, करुणा हो, मातृभाव हो।

लेकिन महिलाएँ आ रही हैं और छा भी रही हैं। कइयों की करुणा सचमुच छीज जाती है। कइयों की बची रह जाती है।

सत्ताधारी पार्टी की नई तारिकाएँ भले ही बिना जाने-समझे गांधी के बारे में कुछ भी कहती-करती हों, लेकिन सुषमा जैसों में एक प्रकार का गांभीर्य बचा हुआ था।

संभव है जेपी जैसे गांधीमना लोगों के सान्निध्य का असर रहा हो। कुछ ‘जेपी वाले’ भी ‘बीजेपी वाले’ बनते ही गांधी को भूलने लगे, लेकिन सुषमा जी में गांधी के प्रति एक लगाव था।

पीटरमैरित्ज़बर्ग में जहाँ गांधी को ट्रेन से निकाल फेंका गया था, वहाँ जब वैसी ही प्रतिकृति वाली ट्रेन में उन्होंने सफर किया तो उनमें एक बालसुलभ उत्साह और उत्फुल्लता नज़र आ रही थी।

और इसी साल ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (ओ आई सी) की बैठक में उन्होंने ‘गांधी के भारत’ का पक्ष रखा।

सुषमा जी के शब्द थे—

  • “भारत उन महात्मा गांधी का 150वाँ जयंती वर्ष मना रहा है जो सत्य और अहिंसा के वैश्विक प्रतीक हैं। इसलिए मेरे लिए, और भारत के लिए यह गर्व की बात है कि इस विशिष्ट वर्ष में मुझे सम्मानित अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है।”


अपने इसी संबोधन के आखिर में वे कहती हैं—

“मैं महात्मा गांधी की धरती से आती हूँ, जहाँ हर प्रार्थना की समाप्ति सबके लिए शांति के आह्वान के साथ होती है।”

राजनीति में खासकर सत्ताधारी पार्टी की नई पीढ़ी के नेतृत्वकारी सत्य, अहिंसा और करुणा के गांधीमार्ग पर सच्चाई से चलेंगे तो देश और दुनिया में शांति, समृद्धि और खुशियाँ आएंगी।

गांधी की प्रतिमा में उनके साथ खड़ी बकरी भी मातृवत करुणा की प्रतीक है। इसलिए गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘गाय ही क्यों, भैंस और बकरी भी हमारी माता हो सकती है क्योंकि हम उनका दूध पीते हैं।’

उजड्ड होती जा रही राजनीति में करुणा का व्यावहारिक स्थान बरकरार रखनेवालीं सुषमा स्वराज परम शांति के कुंज में चिरकालीन विश्राम करें!




यह लेख अव्यक्त की फेसबूक वॉल से साभार है।



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