Dada Saheb Phalke: लाइन वहीं खत्म भी हो जानी है

By - आनंद मंडोई

www.hindidakiya.com

आनंद का डॉक्टर भास्कर करियर की शुरुआत में बस्तियों की खाक छानता है। कुपोषण और बीमारी से हारकर जब एक बच्चे की मां को जवाब दे देता है तभी एक दादी पोते के जन्म की खुशी में मुंह मीठा कराने आती है। भास्कर बुदबुदाता है, एक मरा नहीं और दूसरा आ गया मरने के लिए। उस वक्त उस भाव की प्रबलता को पकड़ने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता, डॉक्टर भास्कर का चेहरा सबकुछ बोल देता है।

और क्लाइमेक्स में जब कैंसर स्पेशलिस्ट डॉक्टर आनंद को बचाने की आखिरी कोशिश के लिए होम्योपैथी की दवाई लेने के लिए दौड़ पड़ता है। लौटकर जब आनंद को निष्प्राण पाता है तो चीख पड़ता है, उठो बातें करो मुझ से। हर शब्द सिर्फ मुंह से ही नहीं आंखों से बह निकलता है।

और सिलसिला कैसे भूल सकते हैं। कवि, शायर और अभिनेता प्रेम की गहराइयों में डूबा रहता है। तभी एक दुर्घटना जीवन बदल देती है, प्रेम पर जिम्मेदारी हावी हो जाती है। प्रेम सिर्फ देह का अभिलाषी नहीं होता, मन के तल पर उससे कहीं अधिक गहरी और सघन अनुभूतियां होती है, जिन्हें वह साझा करना चाहता। एकसाथ जीना चाहता है, जिम्मेदारी और प्रेम के बीच का दोराहा सिर्फ संवादों में नहीं झलकता, बल्कि कशमकश की हर रगड़ उस चेहरे पर भी साफ नजर आती है।  फिर भले ये कहें कि इस फ़िल्म पर उनके व्यक्तिगत किरदार की भी छांह थी, बावजूद इसके अभिव्यक्ति का वह सैलाब किसी अतिरेक का शिकार नहीं होता।

चीनी कम में वही उम्रदराज प्रेम फिर अंगड़ाई लेता है तो चपलता स्वाभाविकता में प्रकट होती है। प्रेम का फूल जितनी मिन्नतों और इंतजार के बाद  खिलता है उतनी ही अधिक खुशबू और ऊष्मा भी देता है। प्रेयसी के पिता के सामने हो, अपनी मां के समक्ष या फिर खुद प्रेमिका के आईने में अपना अक्स निहार रहे हों किसी दृष्टिकोण से यह नहीं लगता कि इसमें कुछ भी थोपा हुआ या अतिरिक्त है। पर्दे पर सबकुछ उतनी ही सहजता से घटित होते चले जाता है, जैसे या आपके बहुत आसपास की बात हो।

फिर वह विजय दीनानाथ चौहान के रूप में ग्वायतोंडे साहब के सामने बैठे हों या फिर कांचा चीना से उसके दर्जी का पता पूछ रहे हों। मां के सामने हाथ धोने का सवाल हो या नर्स के घर खाना मांगते हुए यह कहना कि मां के बाद तुम पहली औरत हो जिसने मुझे बिना कपड़ों के देखा है। हर कहानी नायक के किरदार की विकास या  विनाश की यात्रा होती है। स्टोरी टेलिंग में हम उसे जीवंत करते हैं, पर्दे ओर दर्शक यात्रा का हिस्सा बन जाए, उसे जीने लगे, उसके साथ सुख-दुख, सर्दी-गर्मी का अहसास करने लगे तो ही अभिनय की सार्थकता है। किरदार जैसे जैसे बड़ा होता है भाव उसी अनुपात में प्रबल होते जाते हैं।

फिर अमर अकबर एंथनी की वह कॉमिक टाइमिंग तुम अपुन को 10 मारे, अपुन तुमको एक इच मारा लेकिन सॉलिड मारा न। वही टाइमिंग बड़े मियां छोटे मियां में भी और ठीक वैसी ही तत्परता 102 नॉट ऑउट में भी। पीहू और पिंक में तो एक अलग ही वितान। पीहू में जितने मुखर पिंक में उतने ही खामोश लेकिन कमिटेड। गोया जो बात कहने की है और जो बात पहुंचाने की है, उसे अपने ही तरीके से भेजा जाए।

और आखिर में बड़े कद से छोटे पर्दे पर... भाइयों और बहनों से लेकर कम्प्यूटर जी ए दौलताबाद को ताला लगाया जाए तक। गांव-गांव, गली-गली से आए विभिन्न शख्सियतों से संवाद का कौशल। एक बारगी पर्दे पर प्रकट हो जाएं तो बमुश्किल किसी और पर निगाह पड़े। फिर चाहे लाइन इतनी ही हो कहने के लिए...नवरत्न तेल लगाइए टेंशन जाएगा पेंशन लेने। आपको हर क्षण वही अमित आभा बांधे रखती है, सम्मोहित कर देती है।

क्योंकि वे बताते हैं कि अभिनय आंखों से, चेहरे की भाव भंगिमाओं से, बॉडी लैंग्वेज और संवाद से मिलकर ही नहीं होता इन सबके टुकड़े टुकड़े कर दिए जाएं तो हर टुकड़े में भी वही परिपक्वता नजर आएगी। आप सिर्फ आवाज सुनें, उनकी आंखें पढ़ें, म्यूट करके देखें किसी तरह से भी आजमा लें, आपको हर हिस्से में पूरे के पूरे अमिताभ मिलेंगे। हर हिस्से की पूर्णता ही उन्हें वहां ले जाकर खड़ी करती है, जहां वे अमिताभ हो जाते हैं।

यह उनकी जिद है, जुनून है या श्रेष्ठता के लिए अथक संघर्ष लाइन वहीं से शुरू होनी है जहां वे खड़े हैं। नाउम्मीद नहीं हूं लेकिन अक्सर यही लगता है कि लाइन खत्म भी वहीं हो जानी है।






यह पोस्ट अमित मंडोई जी के फेसबुक वॉल से साभार है।







Comments