दूरदर्शन को समझने के लिए पढ़िए ये जरूरी किताबें

 ःBy - विनीत कुमार


एक पब्लिक ब्रॉडकास्टर और देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क के तौर पर अपनी पहचान रखनेवाले दूरदर्शन के इस साल 60  साल हो गए. 1959  ई. में इसकी शुरूआत हुई थी जिसके कई जरूरी प्रसंग, दिलचस्प किस्से और हैरान करनेवाले फैसले रहे हैं. मैंने अपनी किताब “मंडी में मीडिया” में इस पर विस्तार से लिखा है. समय-समय पर दूरदर्शन को लेकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख भी लिखे हैं और मेरे दिमाग में इसे लेकर बहुत कुछ चलता रहता है.


लेकिन इन दिनों मेरे पास इतना समय है नहीं कि फिर से कुछ नया लिख सकूं. मास्टरी की नौकरी आप ईमानदारी से करें तो शाम होते-होते पूरा शरीर बैटरी रिक्शे सा हो जाता है.

खैर आप लोग मुझसे अक्सर पूछते रहते हैं कि मीडिया पर कौन-कौन सी किताबें पढ़नी चाहिए ? अपनी तरफ से मैं इन किताबों को गौर से पढ़ने की सलाह दूंगा. गंगाधर शुक्ल की किताब को पढ़कर बहुत मजा आएगा. अंदाज-ए-बयां बेहतरीन है. तत्कालीन सरकार और सरकारी बाबुओं की तरीके से आलोचना की है. भास्कर घोष जो अब सागरिका घोष के पिता के तौर पर कुछ लोगों के बीच ज्यादा जाने जाते हैं, कांग्रेस के चहेते होने के बावजूद किताब में जगह-जगह तीखी आलोचना की है.


मीरा के देसाई- विनोद सी. अग्रवाल की किताब से आपको एक माध्यम के तौर पर दूरदर्शन ने भारत में किस तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश रचने का काम किया, इन पहलुओं पर जानकारी बढ़ेगी. नलिन मेहता की किताब से आप जान सकेंगे कि कैसे दूरदर्शन और टीवी का इस्तेमाल सत्ता की आवाज़ और हुक्म के तौर पर किया गया ?  सेवंती नैनन की किताब जिसकी मेरी अपनी प्रति एक तथाकथित मीडिया विशेषज्ञ ने मार ली, दूरदर्शन को समझने के लिए आदि पुस्तक है. और


सुधीश पचौरी की ये किताब मेरे दिल के बेहद करीब है. ये वो किताब है जिसकी कम से कम दस बार मैंने छह प्रति खरीदी होगी. इस किताब की प्रति मेरे घर के उस हर कोने में मौजूद रहती है जहां मैं लिखने-पढ़ने का काम करता हूं. इसकी पचासों कॉपी मैंने खरीदी होगी और जिसे भी दिया, ये कहकर कि अब इसे लौटाने की जरूरत नहीं है. बीए, प्रथम वर्ष में जब मैंने ये किताब पहली बार पढ़ी थी तो सोचा था कि मुझे जब भी मीडिया पर पीएचडी करने का मौका मिलेगा, इस किताब के लेखक के साथ ही करूंगा. सुधीश पचौरी की दर्जनों किताबें आपके बीच होंगी. लेकिन मुझे कुल दो किताबें ऐसी लगती हैं जिन्हें मैं बार-बार पढ़ता हूं, खरीदता हूं और लोगों को उपहार में देता हूं. अभी इसकी तीन प्रति मेरे पास है और मुझे डर है कि आगे नहीं मिली तो फिर दिक्कत हो जाएगी.


इस किताब से गुजरते हुए आप महसूस करेंगे कि टेलिविजन पर रिसर्च कैसे किया जाता है, किन बातों पर गौर करने की जरूरत होती है और एडोर्नों, मैक्लूहान, रेमण्ड विलियम्स, जॉन फिस्के, बौद्रिआं जैसे सांस्कृतिक समीक्षकों के सिद्धांत कितनी सहजता से विश्लेषण के दौरान घुल-मिल जाते हैं. ये दूरदर्शन पर बहुत ही मेहनत से लिखी गयी किताब है.

फिलहाल आप इन्हें पढ़िए. मैं आगे टेलिविजन पर और भी किताबों के बारे में आपसे बातें साझा करूंगा और मौका मिला तो कुछ अलग से भी लिखने की कोशिश करूंगा.


यह लेख विनीत कुमार की वाल से साभार हैं।








Comments