लड़की की हत्या होते देखने वाली मूक भीड़ चाहती है पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध

By - हिंदी डाकिया

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जब भी कश्मीर में या देश के किसी अन्य भाग में कोई बड़ी आतंकवादी घटना होती है और हमारे जवान शहीद होते हैं, तब भारतीयों का खून खौलना हमारे स्वाभाविक देशप्रेम के जज़्बे को दर्शाता है। हाल ही में रविवार को घटी आतंकवादियों की कायरतापूर्ण घटना ने सोशल मीडिया में उन संदेशों की बाढ़ सी ला दी कि अब बस युद्ध ही होना चाहिए। पूरे सोशल मीडिया में शब्दों से जो बाण चलाया जा रहा है उससे तो अब ये महसूस होने लगा है कि  भारत के लोगों में साहस मानो हिचकोले ले रहा है।

लेकिन जब दिल्ली के बुराड़ी के संतनगर में एक 21 साल की एक लड़की को बेरहमी से मारने का वीडियो वायरल होता है, तो सीसीटीवी में दिख रहे आते जाते लोग और जमा भीड़ में अचानक वो साहस गायब सा हो जाता है और कापुरुष की तरह भीड़ में खड़े लोग लड़की के मरने के बाद आरोपी को पकड़कर पीटने की हिम्मत दिखाने लगते हैं। इससे तो बेहतर है कि साहस न ही हो तो अच्छा है।

लोगो के साहस का इस तरह से दो मुँह होना चिंता का विषय है।

पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्यवाही सेना और सरकार क्यों नहीं करती? बच्चियों से लेकर अधेड़ उम्र की महिलाओं से दुष्कर्म में पुलिस कुछ कार्यवाही क्यों नहीं करती? ऐसे न जाने कितने ढेरों सवाल हर घटना के बाद दागते जाना, कैंडल मार्च निकालना, पुतले फूँकने लगना, सोशल मीडिया पर अशिष्टता व अभद्रता का जितना अधिकतम परिचय दिया जा सके देना, ये सब कितना आसान हो गया है करना और कहना, क्योंकि इसमें सिर्फ शब्दों को आयाम देना होता है और शरीर को काम देना होता है। लेकिन क्या देश के लिए नागरिकों की प्रतिबद्धता इसके साथ ही संतुष्ट हो जानी चाहिए?

 क्या इस विषय पर गम्भीरता से विश्लेषण किया है कि एक युद्ध सिर्फ दो देशों का मारपीट वाला मोहल्लाई झगड़ा नहीं है, उसकी अपनी कूटनीतिक और शस्त्रस्तरीय तैयारियां भी शामिल होती हैं। हम उस स्थिति के लिए कितने तैयार हैं, इसका स्वपरीक्षण भी कहीं अधिक मायने रखता है। 

आवश्यकता पड़ने पर सोशल मीडिया में भड़के कितने भारतीयों में दम हैं कि वे देश के लिए स्वयं को या अपनी संतानों को शहीद होने की बात को सोच भी सकते हैं। जब भारत की गलियों और सड़कों पर निरीह मासूम बच्चियों और महिलाओं की अस्मिता के लिए सड़कों से आगे कदम नहीं उठ पाते, वे खुंखार असुरी आतंकवादियों से युद्ध की बात करते कितने शोभा दे सकते हैं, ये उनको सोचना होगा।

देश की सेनाएं, सरकार, प्रशासन को नियमों और कानूनों में बँधकर काम करना ही होगा और वे करेंगे। लेकिन देश में इनके अलावा आम लोगों के भी नैतिकमूल्य हैं। 

आज देश जब अनकहे युद्ध की आशंका को भांप रहा है तब मंद पड़े उस जीन को सुशुप्तावस्था से जगाने की जरुरत है कि साहस को सिर्फ सोशल मीडिया की पोस्ट न बनाया जाए, बल्कि गलियों में विकृतमानसिकताओं की शिकार हो रही अपनी भारतीय लज्जाओं को बचाने में अपना साहस का परिचय भी दे सकें, तब एक सफल युद्ध के सपने देख पाएँ। कथनी और करनी का अंतर कब सफलताएं देता है। देश हमसे काम चाहता है, उथला और थोथले शब्दों का काव्य कदापि नहीं।







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