गूंगी गुड़िया से आयरन लेडी बनने तक के सफर में इंदिरा गांधी द्वारा लिए गए 7 अहम फैसले

By - डाकिया रोशन


Indira Gandhi Indira Gandhi death Iron lady
इंदिरा गांधी भारत के पहले प्रधानमंत्री की पुत्री थी। इंदिरा गांधी का संसद में पहले 'गूंगी गुड़िया' कहकर माखौल उड़ाया गया और फिर उन्हें 'आयरन लेडी' से लेकर 'देवी दुर्गा' तक के तमगों से नवाजा गया। इतना ही नहीं, एक समय तो उनका प्रभुत्व इतना प्रभावशाली हो गया कि उनकी खुशामद में लोग 'इंदिरा इज़ इंडिया और इंडिया इज़ इंदिरा' तक कहने लगे।

युद्ध के मैदान और कूटनीति में पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक को उसकी अवकात दिखाने का काम करने वाली इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू के घर हुआ था। राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली घर में पैदा हुई इंदिरा गांधी ने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कार्यभार संभाला। और इसके बाद जब शास्त्री जी की भी रहस्यमयी ढंग से मौत हो गई, तब इंदिरा गांधी ने प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद शुरुआती दिनों में इंदिरा गांधी संसद और संसद के बाहर अक्सर देश के बड़े मुद्दों पर चुप ही रहा करती थी। उनकी इसी प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए राम मनोहर लोहिया ने उन्हें 'गूंगी गुड़िया' तक कह दिया था। लेकिन आगे चलकर अपने कार्यकाल में इसी गूंगी गुड़िया ने ऐसे-ऐसे फैसले लिए, जिसे लेने की आज के समय में कोई नेता सोच भी नहीं सकता। अब वो फैसले कितने गलत थे और कितने सही? इस पर सबका अपना-अपना मत हो सकता है। लेकिन उन फैसलों को लेने के लिए बहुत ज्यादा दमखम की आवश्यकता को लेकर सभी एकमत होंगे

तो चलिए आज हम जानते है कि वो कौन से 7 सबसे महत्वपूर्ण फैसले थे, जिनके दमपर इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने 'गूंगी गुड़िया से 'आयरन लेडी ऑफ इंडिया' बनने तक का ऐतिहासिक सफर तय किया।

1) बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969)

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी का पहला बड़ा और बेहद साहसी कदम बैंकों का राष्ट्रीयकरण था। 19 जुलाई, 1969 को इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने एक अध्यादेश पारित कर एक झटके में देश के 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। यह फैसला ऐतिहासिक था क्योंकि इन 14 बैंकों में देश का करीब 70 फीसदी धन जमा था। और इंदिरा गांधी के इस कदम से इन सभी बैंकों का मालिकाना हक सरकार के पास चला गया।

2) प्रिवी पर्स को खत्म करना (1971)

जैसा कि हम जानते है कि जब भारत आजाद हुआ, तब उसके साथ 565 से अधिक रियासतें भी अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुई थी। इन सभी रियासतों का भारत में विलय कराने के ऐवज में आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इन सभी रियासतदारों को राजभत्ता या फिर कहे प्रिवी पर्स देने का निश्चय किया था। लेकिन साल 1971 में इंदिरा गांधी ने इसे सरकारी धन की बर्बादी और दुरूपयोग बताकर खत्म कर दिया।इंदिरा गांधी के इस फैसले से जहां राजाओं में नाराजगी पैदा हुई, वहीं जनता ने इसका दिल से स्वागत किया।

3) पाकिस्तान के दो टुकड़े (1971)

जो गजरते हैं वो बरसते नहीं और जो बरसते हैं वो गरजते नहीं। आज के हमारे नेता पाकिस्तान को लेकर जितना गरजते है, उतना बरसते नहीं। वहीं 1971 में इंदिरा गांधी पाकिस्तान  (Pakistan) पर ऐसा कहर बरपाते हुए बरसी कि उसके टुकड़े ही कर दिए। पश्चिमी पाकिस्तान के पूर्वी पाकिस्तान पर बढ़ते जुल्म के चलते रोज लाखों की संख्या में बंगाली मुसलमान अपने जान की हिफाजत के लिए भारत की सीमा में घुसने लगे। तब पड़ोस में पैदा हुई मुश्किल को हल करने के लिए पहले तो इंदिरा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस मसले को हल करने की कोशिश की। और जब इससे बात नहीं बनी तो अमेरिका की हिदायतों/धमकियों को दरकिनार कर पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाने की लड़ाई कूद गईं। इसके बाद जो हुआ उसका गवाह इतिहास है। भारत ने चंद दिनों में पाकिस्तान को युद्ध के मैदान में हर मोर्चे पर पस्त कर दिया। इस युद्ध में भारत का एक सैनिक तक घायल नहीं हुआ था और पाकिस्तान के 90,000 से अधिक सैनिक युद्धबंदी बना लिए गए थे।

4) पोखरण परिक्षण(1974)

शीत युद्ध में जहां हर देश दूसरे देश को अपने हथियारों के बल पर आंखे दिखा रहा था। ऐसे समय में 18 मई 1974 के दिन पोखरण में हुआ परमाणु परीक्षण भारतीय दृष्टि से ऐतिहासिक था। ऑपरेशन 'स्माइलिंग बुद्धा' के तहत भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर सारी दुनिया को हैरत में डाल दिया। साथ ही इस परमाणु परीक्षण के धमाके की आवाज में बिन कुछ कहे दुनिया से यह कह दिया कि परमाणु शक्ति आ जाने के बाद अब हम भी मुकाबले में आ गए है।

5) आपातकाल (1975)

पाकिस्तान को पस्त करने के बाद इंदिरा गांधी का लोहा भारत ही नहीं तो पूरी दुनिया मानने लगी थी। उनके धुर-विरोधी विचारधारा के अटल बिहार वाजपेयी (जो आगे चलकर खुद प्रधानमंत्री बने) तक ने उन्हें देवी दुर्गा का रूप करार दे दिया था। इन सबके चलते इंदिरा गांधी इतनी ज्यादा शक्तिशाली हो गईं कि उन्होंने इन शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसी कड़ी में चुनाव के वक्त सरकारी खजाने का इस्तेमाल करने के अपराध में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी सदस्यता रद्द करते हुए आगामी 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी। लेकिन इंदिरा ने अपनी शक्ति को अपने हाथ से छिनता देख 25 जून 1975 को आपातकाल सरीखा देश के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला फैसला ले लिया। 19 महीने तक चले आपातकाल और इस दौरान लोगों पर हुए जुल्मों ने इंदिरा गांधी पर ऐसा बदनुमा दाग लगाया,जो आज तक छूट नहीं पाया।

6) ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984)

यह ऑपरेशन एक ऐसे राक्षस को खत्म करने के लिए चलाया गया था, जिसे खुद कांग्रेस ने ही अपने फायदे के लिए खाद-पानी देकर बड़ा किया था। पंजाब में अकालियों को टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने जरनैल सिंह भिंडरवाले को पैदा किया। शुरुआत में कांग्रेस को इसका चुनावी फायदा भी हुआ। लेकिन जब अकालियों के लिए पाला गया सांप खुद कांग्रेस को ही फुफकारने लगा, तब कांग्रेस ने 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' (Opration Blue Star) के जरिए जरनैल सिंह भिंडरावाले के फन को कुचल डाला। लेकिन इस कवायद के सिखों की धार्मिक भावना पर सरकार की तरफ से गहरा आघात पहुंचाया गया। स्वर्ण मंदिर में सेना के जूते पहनकर घुसने और गोलीबारी करने से समूचे सिख सुमदाय में इंदिरा गांधी को लेकर रोष भर गया। नतीजतन 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी के ही अंगरक्षक जो कि सिख था ने उनकी गोलियों से भूनकर हत्या कर दी।

7) ऑपरेशन मेघदूत (1984)

कहावत है- कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। पाकिस्तान के मामले में यह कहावत सटीक बैठती है। क्योंकि 1947, 1965 और 1971 में बुरी तरह पिटने के बावजूद 1984 में पाकिस्तान भारत के सियाचिन पर कब्जा करने के ख्वाब देख रहा था। दरअसल पाकिस्तान ने 17 अप्रैल, 1984 को सियाचिन पर कब्जा करने की योजना बनाई थी जिसकी जानकारी भारत को लग गई। और भारत ने इंदिरा गांधी के इशारे पर 'ऑपरेशन मेघदूत' के तहत पाकिस्तान से पहले ही सियाचिन पर कब्जा कर लिया।







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