शुरुआत हो गई है, देखें किसका - किसका नंबर आता है

By- हिन्दी डाकिया

हम तो लुका छुपी खेलेंगे

हमारी खेल प्रतिभा का कोई सानी नहीं। हम जन्म से खिलाड़ी हैं। खेल-कूद कैसे छोड़ सकते हैं? लॉक डाउन, आईसोलाशन, क्वारन्टाइन, सोशल डिस्टेन्सिंग ये अंगरेजी के नए-नए शब्द हमारा हौसला तोड़ने के लिए रचे गए हैं। बचपन में चूहे -बिल्ली का दौड़ खूब खेला है।


चोर-सिपाही बचपन का सबसे प्यारा खेल है। ये जवानी और अधेड़पन में भी उतना ही लोकप्रिय है। देखा नहीं, बिना हेलमेट के दो पहिया उड़ाने में हम किस तरह रिकॉर्ड तोड़ते हैं। लुका-छुपी खेल खेल कर बड़े हुए हैं। जिस खेल में धुरंधर हैं आज उसी को चुनौती? मगर लॉक डाउन में क्या खेल खेला है हमने! सबके होश फ़ाख़्ता हो गए। इधर से छुप के उधर निकले, और उधर से बिलकुल लापता हो गए। लापतागंज में ऐसा भूल भुलैया है कि पूरा प्रशासन खंगालने में लगा है। मिल नहीं रहे। एकाध के पासपोर्ट जब्त हो गए हैं।

ये क्या मतलब है? हर जगह पुलिस के पहरे बैठा दिए हैं। और तो और, हमारे शहर के दरवाजे भी बंद कर दिए। मगर हम पतली गलियों से निकलने के आदी हैं, सो निकल गए। कोई रोक के तो दिखाए! सड़क चौराहों पर इतने जवान लगा रखे हैं। कल किराने की डिलीवरी वाली गाड़ी आई थी, उसी में दुबक के निकल लिए। खेल के साथ अक्ल का इस्तेमाल करने की मनाही है क्या? जवान से डर गए तब तो जी लिए ज़िन्दगी!

इस देश में लड़कियों की खेल प्रतिभा को कमतर समझनेवाले किस दिन सुधरेंगे? महिला खिलाड़ियों को देखने के बाद भी इनका नजरिया नहीं बदला। नहीं चाहिए हौसलाफजाई; दो बहादुर लड़कियों ने लॉक डाउन में साबित कर दिया। उन्हें क्वारन्टाइन कर रखा था। दोनों ने अभूतपूर्व शौर्य का प्रदर्शन करते हुए दौड़ लगा दी। पहुँच गईं घर। हालाँकि बीच में पुलिस ने रोका भी, लड़कियां बोलीं- अस्पताल जा रहे हैं। पुरुष पुलिसकर्मी क्या-क्या सवाल करते? बुद्धिमत्ता जीत गई। वो बेचारे हार गए।

एक से एक खिलाड़ी हैं हमारे यहाँ। हमारे आदरणीय नेतागण तो पहुंचे हुए हैं। एक स्वयंभू खिलाड़ी खुद को आए दिन खिलाड़ी घोषित करते रहता है। उस पर बैन लगना चाहिए। ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’, ‘खिलाड़ियों का खिलाड़ी’, ‘हम हैं खिलाड़ी’ पर किसी का एकाधिकार है क्या? ये सभी उपाधियाँ हमारे नेता जी के लिए सुरक्षित होनी चाहिए। कितना शानदार प्रदर्शन किया है। लॉक डाउन एक ही झटके में तोड़ डाला। एक नेता जी ने राशन सामग्री बांटने को भिजवाई थी। 'अपनी गाड़ी' 'अपने आदमी' लेकर आए 'अपने गरीब लोगों' को बांटने के लिए। खूब भीड़ लगी, लाठियां भंजी। प्रशासन ने कहा, हम बांटते हैं। ऐसे कैसे भरोसा कर लें प्रशासन पर? वोट का खेल है; प्रशासन की लिस्ट से राशन बांटकर खेल का सत्यानाश करना है क्या? विलक्षण एक नहीं, अनेक नेता जी हैं। अपनी - अपनी लिस्ट का खेल खेल रहे हैं। बड़ा मजा आ रहा है। कइयों ने तो भोजन के पैकेट पर अपनी मोहिनी छवि लगवा रखी है। गरीब का आधा पेट तो उसे देख कर ही भर जाता है। बाकी, आधा पेट भोजन उस पैकेट में होता है।

खेल एक से एक हो रहे हैं - वो भी बेहतर रणनीति के साथ। तलवारबाज़ी, निशानेबाज़ी में हमसे कोई जीत सकता है भला? क्या मजाल जो निशाना चूक जाए! पल भर में पुलिस कर्मी का हाथ कलाई से झटक दिया। और सटीक निशाना चाहिए तो पत्थरबाजों को देखिए। देश के अलग अलग कोनों में ऐसी अनेक विलक्षण प्रतिभाएँ मौजूद हैं। आजकल चिकित्साकर्मियों को देखते ही ये लोग काम पर लग जाते हैं। इनको अवार्ड मिलना चाहिए। ये अद्वितीय हैं। दुनिया के किसी देश में अपने जीवनरक्षकों के साथ ऐसा खेल नहीं खेला जाता। हमारे यहाँ पूरे उत्साह से खेलते हैं। इन अद्भुत खेलों के लिए अब तक अवार्ड की घोषणा क्यों नहीं हुई? ऐसी भी क्या बेरुखी?

हमारे प्रधान सेवक अपने संदेशों के साथ चार बार अवतरित हुए। चौथी बार लगा था कि किसी अवार्ड की घोषणा होगी। नहीं हुई। मगर बोला कितना लुभावन। हमारे अनुशासन को देखकर अभिभूत थे, खूब मन से सराहा। जी गदगद हो गया सुनकर, खेलने का हौसला और बढ़ गया। उन्होंने गरीब लोगों को अपना परिवार बताया, उनका ध्यान रखने को कहा। लेकिन जब वो 'मैं' बोलते हैं तो 'एकवचन' ही दिखता है। 'हम' शब्द बोलना भूल गए हैं। फिर गरीब का ध्यान असल में कौन रखे, ये यक्ष प्रश्न है।

प्रधान सेवक जी कितना अच्छा बोलते हैं: भावप्रवण, सम्मोहक, मनभावन। उन्होंने चिकित्साकर्मियों के सम्मान का अनुरोध किया। ये बात बहुत अच्छी लगी। दिल को छू गई। हम जिस तरह अनुशासन में हैं बिलकुल वैसे ही 3 मई तक रहने को बोला है। सुनने के बाद नए करतब प्रकाश में आए। चिकित्सक को रक्तरंजित किया, साथ में एम्बुलेंस भी तोड़ दिया। इसमें महिलाओं की भागीदारी बहुत बढ़चढ़ कर हुई।

प्रधान सेवक जी ने पहले भी कई रोचक बातें कहीं थीं, हमने उसका बड़ा लुत्फ़ उठाया। पहली बार थाली बजाई, ऐसी बजाई कि कोरोना घबरा गया। दो दिन बाद ही प्रधान सेवक आ गए, डर लग गया था; डाँट न पड़ जाए। मगर इस बार दीये जलाने को बोल गए। उनको भी ध्यान नहीं रहा कि हम कितने उत्सवधर्मी हैं। हर काम हर्षोल्लास से करते हैं। दूसरे देशों में क्या हुआ, उससे हमें क्या मतलब? उनकी शुष्कता उनको मुबारक। हम तो उत्सव मनाएंगे और अध्यात्म ढूँढ़ेंगे।

प्रधान सेवक जी सोशल डिस्टन्सिंग पर इतना ज़ोर देते हैं कि इस बार मुझे खुद वो ही याद आ गए। जब से प्रधान बन कर सेवा में आए हैं, हमेशा सोशल डिस्टेंसिंग में रहते हैं। फिर मन की बात तो ऐसे ही करनी पड़ेगी।

एक बात मेरे मन की भी है - कल ट्रेन रुकवा दी, ये अच्छा नहीं किया। हम तैयारी करके बैठे थे घूमने जाने को। गर्मी की छुट्टी बीती जा रही है। हाँ, मगर इस पर भी एक खिलाड़ी शतरंज खेल गया। ऐसा पासा फेंका कि बाज़ी पलट गई। बांद्रा की रौनक लौट आई। हमारी कलमवाली बिरादरी का है कोई। सुना है उसे तमगा मिलेगा। चलो किसी खिलाड़ी को नवाज़ने के बारे में हमारी सरकार ने सोचा तो।


शुरुआत हो गई है, देखें किसका - किसका नंबर आता है…..


यह लेख अमृता मौर्य की फेसबूक वाल से ली गयी है। 




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