बोला था न सरफराज धोख़ा देगा - तपस्वी महाराज

By - डाकिया चमन

सुशांत सिंह राजपूत का जाना किसी झटके जैसा है.


एक लड़का जो पटना में पैदा हुआ. करीब 17 साल का था जब उसकी मां का निधन हुआ.

पूरा परिवार दिल्ली (Delhi)  शिफ्ट हो गया. दिल्ली कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग में 2003 में इंट्रेंस एग्ज़ाम दिया 7वीं रैंक थी.

मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन ले लिया. फ़िजिक्स उसका प्यार था. नेशनल ऑलंपियाड का विनर.

दिल्ली में उसे पता चलता है कि थियेटर और डांस से भी प्यार  करता है. तीन साल इंजीनियरिंग के हो गए थे.

कॉलेज ड्रॉप कर दिया. मुंबई चला गया. बैक स्टेज डांस किया. 2006 में कॉमन वेल्थ गेम्स की ऑस्ट्रेलिया में ओपनिंग सेरेमनी में डांसर के तौर पर गया.

संघर्ष चल रहा था कि नेस्ले मंच के एक विज्ञापन में उसे जगह मिली. बस, फिर कभी मुड़कर नहीं देखा.

काई पो छे से बड़ी  स्क्रीन पर आया. उसके बाद का सब जानते हैं. एमएस धोनी, छिछोरे, केदारनाथ.

कितना कुछ किया. बड़ा किया. स्टार बना. नाम कमाया. पैसा कमाया. अपनी जगह बनाई.

लेकिन प्यार फ़िजिक्स से अब भी. वैसा का वैसा ही.

सुशांत (sushant singh rajput) को मैं इंस्टा पर बहुत दिनों से देख रहा हूं. उनकी पोस्ट देखता था तो हर बार सोचता था कि ये एक्टर सबसे अलग है.


आज के दौर में कौन-सा एक्टर इतना दिमाग लगाता है. वो तारों की बातें करते थे. ग्रेविटी की बातें करते थे.

आर्टिफिशयल इंटेलीजेंस को पढ़ते थे. वो 
लिखते है हमसे दूर किसी और दुनिया के बारे में.

इंजीनियरिंग मैथमेटिक्स पर अपने इंस्टा पर लोगों से बात करते थे. संस्कृत के श्लोक से लेकर कम्यूटर की कोडिंग तक सबकुछ.

गालिब से लेकर हरिवंश राय बच्चन तक. काफ़्का से लेकर गैलिलियो तक.

कलम से कागज पर कविताएं लिखते थे. उनकी राइटिंग बहुत अच्छी थी. फिर एक दिन अचानक पता नहीं क्या हुआ कि उन्होंने अपना इंस्टा बंद कर किया.

पुरानी सभी पोस्ट डिलीट कर दी. उनकी कविताएं. उनका लेखन. उनकी लिखी हुई गजले सभी गायब हो गईं.

सबकुछ चला गया. मैं इंस्टा स्क्रॉल करता था तो सुशांत की कोई पोस्ट नहीं दिखती थी.


ऐसे ही आज वो चले गए. अचानक. बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए.

बिल्कुल वैसी ही जैसे किया था अपना इंस्टा डिलीट. लेकिन इंस्टा पर वो दोबारा आ गए थे, जिंदगी में दोबारा नहीं आ पाएंगे.

डिप्रेशन रहा हो या कोई और वज़ह लेकिन मैं इतना जानता हूं कि वो जीनियस थे, और हर जीनियस जानता है कि उसे कब रूकना है.

लेकिन मौत के आगे वो जीनियस जान ही नहीं पाया कि अब रूक जाना है.

Ashutosh Tiwari सर कहते हैं कि तमाम तरह की दमित इच्छाएं होती हैं- आत्महत्या के कारणों में लेकिन मौजूदा वक़्त में सामाजिकता का अभाव भी आत्महत्या का एक कारण है.

बड़े शहरों की जीवनशैली हमें हमारी जड़ों से काट देती है. पूंजी ने इंसान को इंसान से दूर 
किया है. स्वार्थ उसमें बड़ी भूमिका निभाता है.

पिछले दिनों में मैंने कितने ही ऐसे लोगों को आत्महत्या करते हुए देखा है जो बहुत समझदार थे.

जिन्हें जीवन की समझ आम लोगों से थोड़ी ज्यादा थी. जो देश-दुनिया के बड़े से बड़े मुद्दे पर सोचते थे- लिखते थे.

ऐसे लोग आत्महत्या कैसे कर लेते हैं. लेकिन जो भी है. मौत का सम्मान दुनिया करती है, भले ही जीवन का ना करे.

उसे स्पेस पसंद थे. उसे तारे पसंद थे. उसे आसमान पसंद था. वो वहीं चला गया.

अब तुम्हें शांति मिले. अब तुम सारा आसमान देख लो. अपनी हर जिज्ञासा को शांत कर लो.

अपने हर सवाल का जवाब पा लो. ये दुनिया तुम्हें एक बेहतरीन इंसान के तौर पर ज़रूर याद रखेगी.









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