इन बच्चों की उम्र दस दिन के लगभग रही होगी



एक हथिन की मौत...


भले ही आप नीचे वाली फोटो में झुलसकर मरे हुए तेंदुए के पांच बच्चों और एक सॉ स्केल्ड वाइपर का शव देख रहे हों। लेकिन, यह पोस्ट गर्भिणी हथिनी की हत्या पर है। एक हथिनी जिसे केरल में मार दिया गया। जिसे लेकर कुछ लोग व्यथित हैं तो कुछ लोग इसी की आड़ में सोच रहे हैं कि कुछ उनका भी उल्लू सीधा हो जाए।

पहली बात तस्वीर की है। यह तस्वीर पिछले साल अप्रैल के महीने की है। पुणे के अंबेगांव तालुका में किसानों को संदेह हुआ कि उनके गन्ने के खेत में सांप छिपा हुआ है। इसके चलते उन्होंने खेत और कचरे में आग लगा दी। इसी आग में झुलसकर तेंदुए के ये पांच बच्चे मर गए। तेंदुआ मां इन बच्चों को छोड़कर खाने की तलाश में गई होगी। इन बच्चों की उम्र दस दिन के लगभग रही होगी। जंगल की जगहें कम होने के चलते तेंदुए अक्सर ही गन्ने के खेत में बच्चे दे देते हैं। बड़े होने तक बच्चे उसमें छिपे रहते हैं। इस वीभत्स तस्वीर को पुराना पड़े अभी मुश्किल से सिर्फ साल भर बीता है।

अब हाथियों की बात। पिछले साल शायद फरवरी के महीने में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार को बहुत सारा खुलासा करना पड़ा। सरकार ने बताया कि बीते तीन सालों में इंसान और हाथियों के बीच संघर्ष में 1713 इंसानों और 373 हाथियों की जान चली गई। सबसे ज्यादा हाथी बिजली की तार लगा कर मार दिए गए। तीन सालों में कुल 226 हाथियों की हत्या बिजली का करेंट लगाकर की गई। जबकि, 62 हाथियों की मौत ट्रेन दुर्घटना में हुई। 59 हाथियों को शिकारियों द्वारा और 26 हाथी को जहर देकर मार दिया गया। यह माना जा सकता है कि केरल में मारी गई हथिनी भी इन्हीं में से किसी श्रेणी में आने वाली मौत में शामिल होगी।
अब शेरों की बात। इसी साल मार्च के महीने में गुजरात विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि बीते दो सालों में गुजरात में 260 शेरों और उनके बच्चों की मौत हो गई। इनमें से 138 शेर और 123 बच्चे शामिल हैं। इसी दौरान में 250 तेंदुए और उनके 90 बच्चे भी मारे गए। एशियाई शेर अब सिर्फ भारत के गिर में बचे हैं। एक समय तो वे बिलकुल ही विलुप्त होने वाले थे। लेकिन, नवाब जूनागढ़ के समय से शुरू हुए संरक्षण के तमाम प्रयासों के चलते आज उनकी संख्या छह सौ के लगभग हो चुकी है। इतनी कि अब उनके लिए जंगल भी छोटा पड़ने लगा है। लेकिन, उनको नया घर देने की प्रक्रिया पर किसी का अहंकार कुंडली मारकर बैठ गया है।

कभी भारत के एक बड़े हिस्से पर हाथी स्वच्छंद विचरण किया करते हैं। वे बहुत ही समझदार और संवेदनशील होते हैं। उनकी सूंघने की शक्ति भी बहुत अच्छी होती है। दूर से ही वे खाने का पता लगा लिया करते हैं। वे जंगलों में लंबी दूरी तक विचरण किया करते हैं। लेकिन, अपने पुरखों के जिन रास्तों पर अब वे गुजरने की कोशिश करते हैं, उन रास्तों पर मानवों ने जंगल साफ करके खेती शुरू कर दी है। बाग लगा दिए हैं। हाथी ये नहीं जानते हैं कि ये किसी की निजी संपत्ति है। उन्हें तो अपनी सूंड की पहुंच में आने वाली हर खाने योग्य चीज अच्छी लगती है। तो वे फसलों को भी चट कर जाते है। गन्ना, भुट्टा, केला। किसानों की तरफ से इन्हें भगाने के लिए तमाम बर्बर तकनीक इस्तेमाल की जाती है। खेत की बाड़ पर लोहे के तार लगाकर उसमें करंट दौड़ा दिया जाता है। उन्हें जहर देकर मार दिया है। यह हमारे पूरे देश में हो रहा है।

हाथियों की आबादी खतरे में है। वे हर तरफ तमाम तरीकों मारे जा रहे हैं। इसी प्रकार, अन्य वन्यजीवों की भी हत्या की जा रही है। जरूरत इस बात की है कि उन्हें उनका स्पेस दिया जाए। यह धरती हम सबकी साझी है। इस पर किसी एक प्रजाति का हक नहीं है। अगर ये हाथी खतम हो गए तो पृथ्वी बहुत कुछ खो देगी। कुछ ऐसे काम जो हाथी इस धरती पर रहकर करते हैं। ईकोसिस्टम तहस-नहस होगा।

अफसोस होता है कि एक हथिनी की मौत को सच्चे वन्जजीव संकट के संदर्भ में समझने की बजाय सिर्फ राजनीतिक तौर पर उसे भुनाने की कोशिश की जा रही है।

यह वन्यजीवन का भला नहीं कर रहा है। यह कुछ खास राजनीतिक विचारधाराओं का भला कर रहा है।


(फोटो उसी समय की है और इंटरनेट से साभार ली गई है। )


साभार- Junglekatha की फेसबुक वॉल से ली गयी है।







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