कैसे पहचानें कि जो नेता आज लोकतांत्रिक दिख रहा है वो कल का तानाशाह है?


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कोई तंत्र खुद में सम्पूर्ण नहीं होता. किसी ना किसी कमी से जूझता है. समाज कैसे चले इसे लेकर भी राजनीतिक विज्ञानी सदियों से दिमाग लड़ाते रहे. कितनी तरह के सिस्टम बनकर बिखरे और कुछ निखरे. फिर लोकतंत्र का उदय हुआ जो समय के साथ सुधरा लेकिन कई जगह उसे प्रभावशाली लोगों ने संक्रमित किया जिसका नतीजा ऐसा हुआ कि बाहर लोकतांत्रिक कंकाल तो बना रहा लेकिन भीतर से उसकी आत्मा सत्तावादियों की कैद में चली गई. ये बात बहुत सारे विद्वान मानते हैं कि राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्रहरी होते हैं. यदि वो ठीक से चौकीदारी ना करें तो कोई भी तानाशाह चुपके से राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री निवास में जा घुसता है, लेकिन ये कैसे पता चले कि जो संस्थाएँ हमने चौकीदारी में लगाई हैं उनमें ही कोई सत्तावादी डाकू ना घुस आया हो?

दुनिया में कितने ही नेता ऐसे थे जो सीधे सीधे तानाशाह नहीं थे. उन्होंने लोकतंत्र को पगडंडी के तौर पर इस्तेमाल किया और फिर मंज़िल पर पहुंचकर ऐसे जमे कि हटने से इनकार कर दिया. ये दुनिया भर के लोगों के सामने बड़ा सवाल है कि कैसे हम उन नेताओं को पहचानें जो भविष्य में सत्तावादी होकर लोकतंत्र का गला घोंटनेवाले हैं? ये एक जटिल प्रश्न है. हर कोई हिटलर की तरह तख्ता पलट के विफल प्रयास करने के कारण चिह्नित नहीं हो पाता. ना ह्ययूगो शावेज़ की तरह सैनिक विद्रोह की कोशिश करता धरा जाता है, ना ही मुसोलिनी की तरह उसमें सैनिक शासन के लक्षण साफ दिखते हैं, ना अर्जेंटीना के पेरोन की तरह राष्ट्रपति की लड़ाई में उतरने से पहले वो तख्तापलट करता दिखाई देता है.

आज की बदली दुनिया में अधिकतर तानाशाही प्रवृत्ति वाले नेता लोकतंत्र की भेड़ बनकर आते हैं. अपना समय आते ही वो भेड़िए बन जाते हैं. जब वो भेड़िए बनकर सत्ता की छाती पर बैठ जाते हैं तब जनता और राजनीतिक दलों के लोग माथा पीटते हैं कि आखिर क्यों वो समय रहते इस भेड़िए के नाखून नहीं देख सके थे. डेनियल जिब्लाट और स्टीवन लेविट्स्की ने राजनीति पर एक किताब लिखी थी. How Democracy Dies. ढाई साल पहले आई थी और बहुत मशहूर हुई. उन्होंने भेड़ की खाल में आए भेड़ियों की पहचान हो सके इसके लिए कुछ उपाय बताए थे. उन्होंने कहा था कि चार ऐसे लक्षण हैं जिन्हें आप देखें तो समझ जाएं कि नेता जी कल तानाशाह बनकर उभर सकते हैं. उनमें पूरा पोटेंशिल है कि वो डेमोक्रेसी के हत्यारे साबित होंगे. ये लक्षण मशहूर राजनीतिक विज्ञानी जुुआन लिंज़ की किताब The Breakdown of Democratic Regimes से समझे गए हैं. वैसे, मुझे तो लगता है कि सच ये है कि कई बार लोकतंत्र मारा जा चुका होता है मगर उसकी लाश पर मसाले और बर्फ लगाकर हमें भरमाया जाता है कि वो जि़ंदा है ताकि उसके नाम पर शासन चलते रहें.

बहरहाल, मैं यहां पर उस किताब में बताए चार लक्षण लिखने जा रहा हूं. ये दुनिया के किसी भी देश में लागू हो सकते हैं, किसी भी दल के किसी भी नेता में दिख सकते हैं. अपनी-अपनी विवेक बुद्धि से विभिन्न देशों के लोग अपने आसपास नज़र रखें और लोकतंत्र में सांस ले रहे राजनीतिक दल भी ध्यान रखें कि कौन है जिनमें ये लक्षण दिखने लगे हैं, ताकि समय रहते उसे रोका जा सके.

१. अपने शब्दों और कामों से जो नेता लोकतांत्रिक नियमों को तोड़ता दिखे उससे सावधान हो जाएँ.
२. अपने प्रतिद्वंद्वियों की वैधानिकता को ख़ारिज करे ऐसा नेता भी ख़तरनाक है.
३. हिंसा को प्रोत्साहित करे या सहन करे उससे भी सतर्क होने की ज़रूरत है.
४. अपने विरोधियों जिसमें मीडिया भी शामिल है उनकी नागरिक स्वतंत्रता को घटाने में उत्सुक दिखे वो नेता भी लोकतंत्र के लिए ख़तरा है.




- यह पोस्ट नितिन ठाकुर की फेसबुक वॉल से ली गयी है।




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