ये तस्वीर भारत की स्थिति बताने के लिए काफी है

By - डाकिया आशिक


यूं तो मैंने अब इन मुद्दों पर लिखना बन्द कर दिया है, जिन्हें आप समाजिक, राजनीतिक मुद्दे कहते हैं। मैं कला,साहित्य, सिनेमा, संगीत तक ही सिमट गया हूं। इसलिए कि रोज़ रोज़ इतना दुःख, इतनी पीड़ा, इतना भ्रष्टाचार, इतनी मक्कारी, इतनी नंगई मुझे नहीं लिखी जाएगी। मैं चीखते हुए अपना मानसिक संतुलन खो दूंगा और पागलखाने में भर्ती हो जाऊंगा। लेकिन मनुष्यता जीवित है। जब जब दिल रोयेगा, कलेजा फटेगा, क़लम चलेगी। जैसे आज चल रही है।

इस तस्वीर को पहचानते हैं ? ..नहीं पहचानते तो सुनिए। यह तस्वीर उत्तरप्रदेश के देवरिया की है, जहां बीमार पिता को उसका चार साल का बच्चा स्ट्रेचर पर धक्का लगाकर, अपनी मां के साथ अस्पताल के भीतर ले जा रहा है। पिता को गांव के ही उपद्रवी तत्वों ने एक विवाद में घायल कर दिया था। मां और बेटा अस्पताल पहुंचे तो वहां उनसे स्ट्रेचर बॉय ने घूस मांग ली। अब गरीबों के पास निवाले के लिए पैसे नहीं हैं, घूस कहां से देंगे। नतीजा यह तस्वीर है, जिसमें मां और उसका चार साल का बेटा स्ट्रेचर धकिया रहा है। यह सच्चाई है भारतीय स्वास्थ विभाग में फैली दलाली, घूसखोरी और मक्कारी की।

यह तो एक घटना है। ऐसी घटनाएं रोज़ हो रही हैं। हज़ारों की संख्या में हो रही हैं। जहां गरीब आदमी इलाज के अभाव में दम तोड़ रहा है। कोरोना में तक़रीबन 27000 हज़ार लोग मर चुके हैं। यह सरकारी आंकड़ा है। मौत को लाखों लोगों की हो चुकी है। यह आंकड़ा सामने नहीं आएगा।

भयानक बेरोज़गारी है। लोगों के पास काम नहीं है। गरीबी की यह हालत है कि प्रधानमंत्री छाती पीटकर कहते हैं कि मैं नवंबर तक 80 करोड़ लोगों को राशन, चना दूंगा। यानी वह स्वीकार करते हैं कि भारत भिगमंगो का देश है। 80 करोड़ गरीब लोग हैं तो यह देश सम्पन्न राष्ट्र तो नहीं कहलाएगा जाएगा।

शिक्षा के ऐसे हालात हैं कि फर्जी मार्कशीट का बोलबाला है। अयोग्य व्यक्ति शिक्षक, प्रधानाचार्य बन जाता है। जहां एग्जाम हो रहे हैं, वहां 8 लाख लोग हिंदी में फेल हो जा रहे हैं।

यह हिसाब है स्वास्थ, गरीबी, शिक्षा, रोज़गार का इस देश में। बाढ़ से असम, बिहार त्रस्त हैं। यह हर साल का मुद्दा है। उत्तराखंड में बादल फट रहे हैं। प्राकृतिक आपदा से भयानक रूप से नुक्सान हो रहा है। पुल टूट रहे हैं। सड़क धंस रही है।

यह हमारे देश भारत की हालत है। लेकिन सरकार को बुलेट ट्रेन चाहिए। सरकार को करोड़ों रुपए खर्च कर के एन आर सी, सी ए ए चाहिए। सरकार को पाकिस्तान, चीन से लड़ाई लड़नी है।

मैं इन मुद्दों पर इसलिए भी नहीं क्योंकि मेरे अपने नहीं चाहते कि मैं लिखूं। उनका कहना है कि इन मुद्दों का कोई समाधान नहीं है। मैं इन्हें लिखकर कुछ बदल नहीं पाऊंगा। मुमकिन है कि पार्टियों के भक्त गण मुझसे चिढ़ जाएं। मेरी लोकप्रियता कम हो जाएं। इसलिए क्यूं पंगा लिया जाए। बेहतर है कि अपनी कलाकारी करें।

मैं भी चुप रहता हूं। लेकिन कभी कभी दिल नहीं मानता।  अब कोई चाहे गोली मार दे या कोई सूली पर चढ़ा दे। सच बोलना सीखा है, ईमानदारी ख़ून में है इसलिए उससे पीछे नहीं हट सकूंगा।

इन विषमताओं को देखते हुए ही मेरा संसार में मन रमता नहीं है। कैसे कोई इस वक़्त में शादी करे, जश्न मनाए। अगर राष्ट्र इस दुर्गति को प्राप्त हो जाता और भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चन्द्र बोस जीवित होते तो क्या वह मलाईदार चाय पीते ?

समस्याएं वहीं हैं। समाज भी वैसा है। हां यह लिखकर मुझे थोड़ा सुकून ज़रूर मिला है।















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