मैं राहत साहब के कुनबे यानी लेखक समाज का एक छोटा सा चिराग़ हूं

By - आशिक़

अभी कुछ देर पहले पता चला कि राहत इंदौरी साहब का निधन हो गया। आज सवेरे ही उनके कोरोना संक्रमित होने की ख़बरें अा रही थीं। अस्पताल ने उनकी मृत्यु की वजह हार्ट अटैक बताई है। इतना दिलदार, दिलेर शायर हृदय गति रुकने से रुखसत ले गया, यह पीड़ा देता है। 

राहत साहब के इस तरह चले जाने से आश्चर्य नहीं है। यह साल मनहूस है इसलिए अब मैंने ख़ुद को मनहूस खबरों के लिए तैयार कर लिया है । जब से राहत साहब के देहांत की ख़बरें टीवी पर प्रसारित की जा रही हैं, मित्रों, परिचितों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे हैं। यह बात मन को सुकून देती है कि मैं राहत साहब के कुनबे यानी लेखक समाज का एक छोटा सा चिराग़ हूं, जिस कारण लोग मुझे मैसेज कर अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं। मैं भावुक हूं। मेरी कई यादें राहत साहब से जुड़ी हुई हैं। इस लेख के माध्यम से मैं राहत साहब को याद कर रहा हूं। यही मेरी श्रद्धांजलि होगी। 

बीटेक के दिनों में जब कवि सम्मेलन सुनने का चस्का लगा तो उसके ज़िम्मेदार कुमार विस्वास थे। यूट्यूब पर उनके ही विडियोज़ की धूम थी। तब तक जौन एलिया सोशल मीडिया में वायरल नहीं हुए थे। उन दिनों कुमार विस्वास के साथ एक शख़्स हर कवि सम्मेलन, मुशायरे में मौजूद रहते, जिनकी शायरी की जितनी इज़्ज़त होती, उतनी ही उनकी शख्सियत की भी होती। लोग घंटों बैठकर, देर रात तक उन्हें सुनने का इंतज़ार करते। हिन्दुस्तान का कोई भी मुशायरा उनके कलाम के बिना अधूरा ही माना जाता था। वह शख़्स थे राहत इंदौरी, जो मौजूदा उर्दू शायरी के सबसे बड़े हस्ताक्षर बनकर हर कवि सम्मेलन, मुशायरे की शोभा बढ़ाते थे। 

राहत इंदौरी साहब की शायरी तो अद्भुत थी ही उनकी शख्सियत भी ज़ोरदार थी। जिस तरह से वह शेर पढ़ते, पूरा मंच, पूरा हौल, स्टेडियम, पंडाल झूम उठता था। सभी श्रोताओं का रोम रोम ऊर्जा, जोश से खिल उठता था। लोगों में स्फूर्ति अा जाती थी। लोग वाहवाही करते नहीं थकते थे। 

कोई भी युवा पीढ़ी का शायर नहीं होगा जो राहत साहब से प्रभावित नहीं हुआ होगा। हर युवा, जब शायरी शुरू करता है, यूट्यूब पर शायरी के वीडियो देखता है तो वह राहत साहब को ज़रूर सुनता है। सुनकर उनके अंदाज़ को ज़रूर कॉपी करता है। राहत साहब के अंदाज़ में शेर लिखने की कोशिश करता है। यह सामान्य, स्वाभाविक बात है। राहत साहब को जो शोहरत, इज़्ज़त, मुहब्बत हासिल थी, हर युवा चाहता था कि वह उसे भी मिले। इसलिए वह राहत साहब हो जाना चाहता था। चाहे यह असफल कोशिश थी, लेकिन युवाओं में राहत इंदौरी बनने का जुनून कम होने का नाम नहीं लेता था। 

राहत साहब इससे जुड़ा क़िस्सा सुनाते थे। लखनऊ में एक रोज़ एक मुशायरे में एक युवा शायर ने अपना कलाम पड़ना शुरू किया। शुरुआत में ही आवाज़ की बुलंदी और उतार चढ़ाव से यह ज़ाहिर हो गया कि वह राहत इंदौरी बनने की कोशिश कर रहा है। जब राहत साहब माइक पर आए तो उन्होंने उस शायर को इशारे में समझाते हुए कहा " राहत इंदौरी बनने के लिए आवाज़ तो बुलन्द करनी पड़ती ही है लेकिन साथ में मुंह भी काला करना पड़ता है "। यह सुनकर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह अंदाज़ था राहत इंदौरी का। 

राहत साहब हंसी मज़ाक में भी ख़ूब शामिल रहते थे। अक्सर मंच से उनके साथी  मुन्नवर राणा कहते कि ये जो राहत इंदौरी अपने नाम में डॉक्टर लगाता है यह शर्तिया फर्जी डिग्री की बदौलत है। इस पर राहत साहब बाक़ी लोगों की तरह ही ठहाके लगाकर हंसते थे। 

राहत साहब की शायरी में जो असर था, जो दम था, जो आम जनता की बात थी, वही उन्हें लोकप्रिय, जनप्रिय बनाती थी। युवा उनकी शायरी से इसलिए प्रभावित होते क्योंकि उनकी भाषा युवाओं के दिलों को छू जाती थी। उनकी शायरी गालिब, ज़ौक या मीर के जैसी नहीं थी कि जिसे समझने के लिए बहुत इल्म हासिल करना पड़ता। अनपढ़ आदमी भी उनकी शायरी का भरपूर लुत्फ ले सकता था। 

राहत साहब की शख्सियत मकबूल हुई तो इसके पीछे उनके तेवर, उनका लहजा था। उनके मिसरे " बुलाती है मगर जाने का नहीं " " किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है ", " सरहद पर बहुत तनाव है क्या " इस बात की गवाही देते हैं कि उन्होने पूरी जिदंगी बिना डर के अपनी आवाज़ बुलंद की। उन्होंने सरकार की आरती, गुलामी नहीं की। उन्होंने हमेशा जनता के हक़, हुक़ूक़ की बात की। 

राहत साहब इस बात की मिसाल थे कि शायर ज़माने का होता है किसी कौम का नहीं। इसलिए हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी उनसे बेइंतहा मुहब्बत करते हैं। यह भी अद्भुत बात है कि आज देश भर में होने वाले ओपन माइक में सबसे ज़्यादा फैन राहत इंदौरी साहब के हैं। कई बार यह देखने में आया है कि लोग राहत साहब के शेर अपने नाम से पढ़ देते हैं। इस वर्ष की शुरुआत में जब वेलेंटाइन वीक में उनका मिसरा " बुलाती है मगर जाने का नहीं " टिक टॉक पर वायरल हुआ तो उसे लेकर भी राहत साहब ने बड़ा दिल दिखाया और इसका सारा क्रेडिट अपने सुनने वालों को दिया। 

राहत साहब ने कभी भी किसी धर्म, विचार पर ओछी टिप्पणी नहीं की। बल्कि वह तो समाज को आगाह करते थे कि हम अभी भी नहीं समझे तो यह सांप्रदायिक ताकतें हमें खोखला कर बर्बाद कर देंगे। राहत साहब के व्यक्तित्व की विराटता इसी बात से झलकती है कि जब इंदौर में मुस्लिम समाज के लोगों ने कोरोना टेस्ट करने आए डॉक्टर्स पर हमला किया तो राहत इंदौरी साहब ने सामने आकर माफी मांगी। उन्होंने कहा कि मैं इंदौर शहर का बुज़ुर्ग होने के नाते आप सभी डॉक्टर्स से माफी मांगता हूं। 

राहत साहब ने शायरी को घर घर तक, फ़ोन फ़ोन तक पहुंचाया। वह भारत के तमाम कॉलेज, यूनिवर्सिटी में खूब सुने जाते हैं। मेरे ख़ुद के बीटेक कॉलेज में राहत इंदौरी साहब का शो हुआ था। मुझे इस बात का उम्र भर अफ़सोस रहेगा कि वह शो मेरे कॉलेज से पास आउट होने के बाद हुआ था और मैं राहत इंदौरी साहब को देखने से वंचित रह गया। 

कभी कभी राहत साहब नाराज़ भी हो जाते थे। इसकी वजह होती आज की युवा पीढ़ी की लापरवाही। राहत साहब जब कभी आईआईटी, आईआईएम में आयोजित कवि सम्मेलन में शिरकत करते तो बच्चों को यही हिदायत देते कि आपको लापरवाह नहीं शुक्र गुज़ार होना है। आपके माता पिता ने जिस मेहनत से आपको पाला है, उसका एहसास आपको होना चाहिए। आप बेशक आज़ादी से जीवन जिएं। लेकिन अपने परिवार, अपने देश, अपने समाज के प्रति अपने दायित्व का एहसास भी आपके भीतर रहना चाहिए। 

जैसा कि हर बड़े शायर का अंदाज़ होता है कि वह अपने वजूद की गहराई से अपने सुनने वालों को ज़रूर रूबरू करवाता है। ग़ालिब और जौन एलिया ने अपने अंदाज में इस बात को कहा कि उनकी शायरी, उनकी शख्सियत बहुत ख़ास है। इसलिए उनका एहतराम होना चाहिए। राहत साहब ने भी कई मौकों पर यह बात कही। जो जायज़ भी थी। एक बार एक यूनिवर्सिटी के कवि सम्मेलन में जब बच्चे शोर मचाने में व्यस्त थे तो राहत साहब बोले " बच्चों, ये जो शख़्स तुम्हारे सामने खड़ा है, यह आधी दुनिया में घूमकर शायरी सुना चुका है, कई देश चाहते हैं कि मैं उनके देश में आकर शो करूं लेकिन मेरे पास वक़्त नहीं होता, आप ख़ुश क़िस्मत हैं जो मुझे सुन रहे हैं, मुझसे रूबरू हो रहे हैं, इस मौक़े को यूं ही मत व्यर्थ कीजिए "। इतना सुनकर सब जगह सन्नाटा छा गया। फिर सबने पूरे मन से, ध्यान से राहत साहब को सुना। राहत साहब ध्यान से सुनने वाली शख्सियत ही थे। कब, कौन सी पते की बात कह जाएं, मालूम नहीं चलता।  इसलिए सतर्क रहना ज़रूरी रहता। 

राहत साहब के क़िस्से, उनकी शायरी अभी आने वाली पीढ़ियों को ऊर्जा, रोशनी देती रहेगी। राह दिखाती रहेगी। शायर कब मरा करते हैं। वह तो अमर हो जाते हैं। आज राहत साहब अमर हो गए हैं।

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